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अस॑र्जि वा॒जी ति॒रः प॒वित्र॒मिन्द्रा॑य॒ सोम॑: स॒हस्र॑धारः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

asarji vājī tiraḥ pavitram indrāya somaḥ sahasradhāraḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अस॑र्जि । वा॒जी । ति॒रः । प॒वित्र॑म् । इन्द्रा॑य । सोमः॑ । स॒हस्र॑ऽधारः ॥ ९.१०९.१९

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:109» मन्त्र:19 | अष्टक:7» अध्याय:5» वर्ग:21» मन्त्र:9 | मण्डल:9» अनुवाक:7» मन्त्र:19


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सहस्रधारः) अनन्तसामर्थ्ययुक्त (सोमः) सर्वोत्पादक परमात्मा (इन्द्राय) कर्मयोगी के लिये (असर्जि) उपदेश द्वारा प्राप्त होते हैं। (वाजी) वह बलस्वरूप परमात्मा (तिरः) अज्ञान को तिरस्कार करके (पवित्रं) अन्तःकरण को पवित्र बनाते हैं ॥१९॥
भावार्थभाषाः - परमपिता परमात्मा जो इस चराचर ब्रह्माण्ड का अधिपति है, वह अनन्त सामर्थ्ययुक्त है, उसके सामर्थ्य को उपदेशों द्वारा कर्मयोगी लाभ करता है ॥१९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

इन्द्राय सोमः सहस्त्राधारः

पदार्थान्वयभाषाः - (वाजी) = यह शक्तिशाली सोम (पवित्रम्) = पवित्र हृदय वाले पुरुष में (तिरः असर्जि) = तिरोहित रूप से सृष्ट किया जाता है। पवित्र हृदय पुरुष में यह रुधिर में व्याप्त रहता है । (सोमः) = यह सोम (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिये (सहस्त्रधारः) = हजारों प्रकार से धारण करनेवाला है । शरीर के अन्दर शक्ति व ज्ञान का यह सोम ही स्रोत बनता है। हृदय में दिव्यता को भी यही उत्पन्न करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-जितेन्द्रिय पुरुष से धारित यह सोम सहस्रों प्रकार से उसका धारण करता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सहस्रधारः) अनन्तसामर्थ्यवान् (सोमः) सर्वोत्पादकः परमात्मा (इन्द्राय) कर्मयोगिने (असर्जि) उपदिष्टः (वाजी) बलस्वरूपः सः (तिरः) अज्ञानं तिरस्कृत्य (पवित्रम्) अन्तःकरणं पवित्रयति ॥१९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Soma, the vibrant victor spirit of divinity of infinite streams of joy, manifests through the purity of heart for the soul’s experience.