अ॒भि द्यु॒म्नं बृ॒हद्यश॒ इष॑स्पते दिदी॒हि दे॑व देव॒युः । वि कोशं॑ मध्य॒मं यु॑व ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
abhi dyumnam bṛhad yaśa iṣas pate didīhi deva devayuḥ | vi kośam madhyamaṁ yuva ||
पद पाठ
अ॒भि । द्यु॒म्नम् । बृ॒हत् । यशः॑ । इषः॑ । प॒ते॒ । दि॒दी॒हि । दे॒व॒ । दे॒व॒ऽयुः । वि । कोश॑म् । म॒ध्य॒मम् । यु॒व॒ ॥ ९.१०८.९
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:108» मन्त्र:9
| अष्टक:7» अध्याय:5» वर्ग:18» मन्त्र:4
| मण्डल:9» अनुवाक:7» मन्त्र:9
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (द्युम्नम्) दीप्तिवाला (बृहत्, यशः) बड़े यशवाला (इषस्पते) हे ऐश्वर्य्यों के पति परमात्मन् ! (अभि, दिदीहि) आप हमको ऐश्वर्य्य प्रदान करें। (देवयुः) दीप्ति को प्राप्त (देव) दिव्यस्वरूप परमात्मन् ! (मध्यमम्, कोशम्) अन्तरिक्षकोश को (वि, युव) आप हमें विशेषरूप से समाश्रित करें ॥९॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में परमपिता से ऐश्वर्य्यप्राप्ति की प्रार्थना की गई है कि हे परमात्मन् ! आप ऐश्वर्य्यरूप सम्पूर्ण कोषों के पति हैं, कृपा करके हमें भी विशेषरूप से सम्पत्तिशील बनावें ॥९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
वि कोशं मध्यमं युव
पदार्थान्वयभाषाः - हे (देव) = प्रकाशमय ! (इषस्पते) = हमारे जीवनों प्रभु प्रेरणाओं के रक्षक सोम ! तू हमें (द्युम्नं अभि) = ज्ञान ज्योति की ओर ले चल । तथा (बृहद् यश:) = महान् यश की ओर ले चल । (देवयुः) = दिव्यगुणों को हमारे साथ जोड़ने की कामना वाला यह सोम है। तू (दिदीहि) = हमें दिव्यगुणों व प्रकाश को इस (मध्यमम् कोशम्) = मनोमय कोश को, जिसके एक ओर अन्नमय व प्राणमय है, तथा दूसरी ओर विज्ञानमय व आनन्दमय, उस मध्यम कोश को (वियुव) = सब बुराइयों से पृथक् कर ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से 'ज्योति, यश व दिव्यगुण' प्राप्त होते हैं। इस के रक्षण से मन की पवित्रता सिद्ध होती है।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (द्युम्नं) दीप्तिमत् (बृहद्यशः) बृहद्यशोयुक्तमैश्वर्यं (इषस्पते) हे ऐश्वर्यपते परमात्मन् ! (अभि, दिदीहि) मह्यं ददातु (देवयुः) दीप्तिमान् (देव) हे दिव्यरूप ! (मध्यमं, कोशं) अन्तरिक्षकोशं (वि, युव) विशेषेण मया योजयतु ॥९॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - O refulgent generous Soma spirit of life, lover of divinities, master of food and energy for body, mind and soul, give us the light to rise to the honour and excellence of higher life towards divinity, and for that pray open the middle cover of the soul and let us rise to the state of divine bliss.
