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त्वं ह्य१॒॑ङ्ग दैव्या॒ पव॑मान॒ जनि॑मानि द्यु॒मत्त॑मः । अ॒मृ॒त॒त्वाय॑ घो॒षय॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvaṁ hy aṅga daivyā pavamāna janimāni dyumattamaḥ | amṛtatvāya ghoṣayaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वम् । हि । अ॒ङ्ग । दैव्या॑ । पव॑मान । जनि॑मानि । द्यु॒मत्ऽत॑मः । अ॒मृ॒त॒ऽत्वाय॑ । घो॒षयः॑ ॥ ९.१०८.३

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:108» मन्त्र:3 | अष्टक:7» अध्याय:5» वर्ग:17» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:7» मन्त्र:3


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पवमान) हे सबको पवित्र करनेवाले परमात्मन् ! (त्वम्, दैव्या, जनिमानि) पवित्र जन्मों को लक्ष्य रखकर (द्युमत्तमः) दीप्तिवाले आप (अमृतत्वाय) अमृतभाव का (घोषयः) घोषण करते हैं (हि) निश्चय करके (अङ्ग) हे सर्वप्रिय परमात्मन् ! आप ही सबका कल्याण करनेवाले हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - वही परमपिता परमात्मा विद्वान् तथा सत्कर्मी जीवों को कल्याण के देनेवाले और वही सबका पालन पोषण करनेवाले हैं ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

द्युमत्तमः

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अंग) = गतिशील जीवन को स्फूर्तिमय बनानेवाले (पवमान) = पवित्र करनेवाले सोम ! (त्वं हि) = तू ही (दैव्या जनिमानि) = सब देवों से सम्बद्ध, सब इन्द्रियों से सम्बद्ध शक्ति विकासों को (अमृतत्वाय घोषयः) = अमृतत्व के लिये घोषित करता है। बाह्य जगत् के सब सूर्य आदि देव शरीर में चक्षु आदि इन्द्रियों के रूप में निवास करते हैं। इन देवों की शक्ति का विकास इस सोम के द्वारा ही होता है । सोम से शक्ति सम्पन्न बन सब इन्द्रियाँ अक्षीण शक्ति व अमर बनी रहती हैं। हे सोम ! तू ही (द्युमत्तमः) = जीवन को अधिक से अधिक ज्योतिर्मय बनानेवाला है । सोम ही ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम ही सब इन्द्रियों की अक्षीण शक्ति व अमर बनाता है यह ही जीवन को ज्योतिर्मय करता है।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पवमान) हे सर्वस्य पावक परमात्मन् ! (त्वं, दैव्या, जनिमानि) पवित्रजन्मान्यभिलक्ष्य (द्युमत्तमः) दीप्तिमान् भवान् (अमृतत्वाय) अमृतभावाय (घोषयः) घोषणं करोति (हि) निश्चयेन (अङ्ग) हे सर्वप्रिय ! भवानेव सर्वेषां कल्याणं करोति ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Soma, dear as life, pure and purifying, most refulgent enlightened spirit, only you can call up bom humanity to holy life and proclaim the path to immortality.