पदार्थान्वयभाषाः - हे सोम ! तू (इन्द्रस्य) = जितेन्द्रिय पुरुष के इस (हार्दि) = हृदयंगम, अत्यन्त सुन्दर व प्रशंसनीय (सोमधानमः) = सोम के आधारभूत शरीर कलश में आविश इस प्रकार प्रविष्ट हो, (इव) = जैसे कि (सिन्धवः) = नदियाँ (समुद्रम्) = समुद्र में प्रविष्ट होती हैं । हे सोम ! तू (मित्राय) = सबके प्रति स्नेह वाले, (वरुणाय) = निर्देषता को धारण करनेवाले, (वायवे) = निरन्तर गतिशील पुरुष के लिये (जुष्टः) = प्रेम से सेवित होता है। तू (दिवः) = मस्तिष्क रूप द्युलोक को (उत्तमः) = सर्वोत्तम (विष्टम्भः) = धारक होता है। सुरक्षित सोम इस मस्तिष्क में ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण के लिये 'जितेन्द्रियता 'स्नेह, निर्दोषता व क्रियाशीलता' साधन हैं। यह मस्तिष्क का सर्वोत्तम धारक है। गतमन्त्र के अनुसार मस्तिष्क के उत्तम धारक सोम का रक्षण करते हुए ये व्यक्ति 'धिष्ण्याः [धिषणायां साधुः] उत्तम बुद्धि वाले बनते हैं। इसके द्वारा 'अग्नयः ' निरन्तर आगे चलनेवाले होते हैं। ऐश्वर्य :- [ईश्वरस्य इमे ] ये प्रभु के पूरे विश्वासी आस्तिक बनते हैं । ये कहते हैं-