इन्द्रा॑य सोम॒ पात॑वे॒ नृभि॑र्य॒तः स्वा॑यु॒धो म॒दिन्त॑मः । पव॑स्व॒ मधु॑मत्तमः ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
indrāya soma pātave nṛbhir yataḥ svāyudho madintamaḥ | pavasva madhumattamaḥ ||
पद पाठ
इन्द्रा॑य । सो॒म॒ । पात॑वे । नृऽभिः॑ । य॒तः । सु॒ऽआ॒यु॒धः । म॒दिन्ऽत॑मः । पव॑स्व । मधु॑मत्ऽतमः ॥ ९.१०८.१५
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:108» मन्त्र:15
| अष्टक:7» अध्याय:5» वर्ग:19» मन्त्र:5
| मण्डल:9» अनुवाक:7» मन्त्र:15
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे सर्वोत्पादक परमात्मन् ! (इन्द्राय, पातवे) कर्मयोगी की तृप्ति के लिये (नृभिः, यतः) साक्षात्कार किये हुए आप जो (मधुमत्तमः) अत्यन्त मीठे और (मदिन्तमः) आह्लादक गुणों को धारण किये हुए हैं, (स्वायुधः) स्वाभाविक शक्तिप्रद आप (पवस्व) हमारे ज्ञान का विषय हों ॥१५॥
भावार्थभाषाः - हे आनन्दवर्द्धक तथा आह्लादजनक गुणसम्पन्न परमात्मन् ! आप ऐसी कृपा करें कि हम लोग ज्ञानयोगी तथा कर्मयोगी बनकर आपका साक्षात्कार करते हुए आनन्द को प्राप्त हों ॥१५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
मदिन्तमः - मधुमत्तमः
पदार्थान्वयभाषाः - हे (सोम) = वीर्य ! तू (इन्द्राय पातवे) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिये पान के लिये (पवस्व) = प्राप्त हो । जितेन्द्रिय पुरुष तेरा पान करनेवाला बने । (नृभिः) = उन्नतिपथ पर चलनेवाले मनुष्यों से (यतः) = संयत हुआ हुआ तू (स्वायुधः) = उत्तम 'इन्द्रिय, मन व बुद्धि' रूप आयुधों वाला हो। (मदिन्तमः) अतिशयेन उल्लास को प्राप्त करानेवाला बन । (मधुमत्तमः) = जीवन को अत्यन्त मधुर बनानेवाला तू (पवस्व) = हमें प्राप्त हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-जितेन्द्रिय व उन्नतिपथ पर चलने वालों से सुरक्षित हुआ हुआ सोम इन्द्रियाँ, मन व बुद्धि' को उत्तम बनाता है उल्लास व माधुर्य को उत्पन्न करता है ।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे सर्वोत्पादक परमात्मन् ! (इन्द्राय, पातवे) कर्मयोगितृप्तये (नृभिर्यतः) मनुष्यैः साक्षात्कृतो भवान् (मधुमत्तमः) अत्यन्तमधुरान् (मदिन्तमः) आह्लादकांश्च गुणान् धारयति (स्वायुधः) स्वाभाविकशक्तिप्रदो भवान् (पवस्व) मज्ज्ञानविषयो भवतु ॥१५॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - O Soma, life divine, realised by leading lights, wielding noble arms of defence, being most exciting and bearing sweetest honey gifts, flow forth in consciousness for the soul’s fulfilment and for glory of the social order.
