पदार्थान्वयभाषाः - (सोतृभिः) = उत्पन्न करनेवाले इन सोम के उत्पादक पुरुषों से (हियानः) = शरीर के अन्दर प्रेरित किया जाता हुआ यह (इन्दुः) = सोम (अपः वसानः) = कर्मों को धारण करता हुआ (कोशं परि अर्षति) = आनन्दमय कोश की ओर गतिवाला होता है। (ज्योतिः जनयन्) = यह हमारे जीवनों में ज्ञान की ज्योति को उत्पन्न करता है । (मन्दनाः) = स्तुतियों की (अवीवशत्) = कामना करता है, अर्थात् हमारे अन्दर प्रभु स्तवन की वृत्ति को पैदा करता है । (गाः) = इन ज्ञान की वाणियों को (निर्णिजम् न कृण्वानः) = शोधक के रूप में करता है । सोमरक्षण से दीप्त हुई हुई ज्ञान की वाणियाँ हमारे जीवनों को शुद्ध करती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम हमारे जीवनों को ज्ञानमय, स्तुतिप्रवण व शुद्ध करता है। अगले सूक्त में ('गौरिवीति:') = सात्त्विक भोजन वाला, (शक्ति) = शक्ति का पुंज, (उरु:) = विशाल हृदयवाला, (ऋजिष्वा) = सरलमार्ग से गतिवाला, (ऊर्ध्वसद्मा) = ऊपर ब्रह्मलोक में अपना घर बनानेवाला, पार्थिव भोगों में न फँसनेवाला, (कृतयशाः) = यशस्वी जीवन वाला, (ऋणञ्चयः) = रेतः कण रूप जलों का सञ्चय करनेवाला [ॠणं, जलम्] ये ऋषि हैं। ये सोम का शंसन करते हुए कहते हैं-