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पु॒ना॒नश्च॒मू ज॒नय॑न्म॒तिं क॒विः सोमो॑ दे॒वेषु॑ रण्यति । अ॒पो वसा॑न॒: परि॒ गोभि॒रुत्त॑र॒: सीद॒न्वने॑ष्वव्यत ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

punānaś camū janayan matiṁ kaviḥ somo deveṣu raṇyati | apo vasānaḥ pari gobhir uttaraḥ sīdan vaneṣv avyata ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पु॒ना॒नः । च॒मू इति॑ । ज॒नय॑न् । म॒तिम् । क॒विः । सोमः॑ । दे॒वेषु॑ । र॒ण्य॒ति॒ । अ॒पः । वसा॑नः । परि॑ । गोभिः॑ । उत्ऽत॑रः । सीद॑न् । वने॑षु । अ॒व्य॒त॒ ॥ ९.१०७.१८

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:107» मन्त्र:18 | अष्टक:7» अध्याय:5» वर्ग:15» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:7» मन्त्र:18


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (चमू) जीव तथा प्रकृतिरूपी संसार के आधारभूत दोनों शक्तियों को (पुनानः) पवित्र करता तथा (मतिम्) बुद्धि को (जनयन्) उत्पन्न करता हुआ (कविः) सर्वज्ञ (सोमः) सर्वोत्पादक परमात्मा (देवेषु) सूर्यादि दिव्यशक्तिवाले पदार्थों में (रण्यति) सर्वव्यापक भाव से विराजमान होता है, (अपः, वसानः) कर्मों का अध्यक्ष परमात्मा (गोभिः, उत्तरः) ज्ञानेन्द्रियों द्वारा साक्षात्कार किया हुआ (परिसीदन्) अन्तःकरणों में विराजमान होता तथा (वनेषु) सम्पूर्ण लोक-लोकान्तरों में (परि, अव्यत) सब ओर से रक्षा करता है ॥१८॥
भावार्थभाषाः - द्युभ्वादि लोक-लोकान्तर एकमात्र परमात्मा ही के आधार पर स्थित होने से योगीजन सर्वत्र सुरक्षित रहता है ॥१८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अपः परिवसान:

पदार्थान्वयभाषाः - (चमू) = द्यावापृथिवी को, मस्तिष्क व शरीर को (पुनानः) = पवित्र करता हुआ, (मतिं जनयन्) = बुद्धि को प्रादुर्भूत करता हुआ (कविः) = क्रान्तदर्शी- सूक्ष्म दृष्टि वाला (सोमः) = सोम [वीर्य] (देवेषु) = दिव्यगुणों की वृत्ति वाले पुरुषों में (रण्यति) = [रण् शके] हृदयस्थ प्रभु की वाणी को प्रकट करता है । (मानो) = यह सोम ही उन शब्दों का उच्चारण करता हो । (अपः परि वसानः) = कर्मों को समन्तात् धारण करता हुआ, निरन्तर क्रियाशील बनता हुआ (गोभिः) = ज्ञान की वाणियों के द्वारा (उत्तर:) = सब वासनाओं को तैरनेवाला यह सोम (वनेषु) = सभजनकर्ता उपासकों में (सीदन्) = स्थित होता हुआ अव्यत सुरक्षित किया जाता है व संवृत किया जाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम मस्तिष्क व शरीर को पवित्र करता है। बुद्धि को उत्पन्न करता है, हमारी सूक्ष्म दृष्टि बनाता है। इसके रक्षण से हम क्रियाशील व उत्कृष्ट ज्ञान की वाणियों वाले बनते हैं ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (चमू) जीवप्रकृतिरूपे संसाराधारीभूते उभयशक्ती (पुनानः) पावयन् (मतिं) बुद्धिम् (जनयन्) उत्पादयन् (कविः) सर्वज्ञः (सोमः) परमात्मा (देवेषु) सूर्यादिदिव्यशक्तिमत्पदार्थेषु (रण्यति) सर्वव्यापकत्वेन विराजते (अपः, वसानः) कर्माध्यक्षः सः (गोभिः, उत्तरः) ज्ञानेन्द्रियैः साक्षात्कृतः (परिसीदन्) अन्तःकरणे विराजते (वनेषु) सर्वलोकेषु (परि, अव्यत) सर्वथा रक्षति च ॥१८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Pervading and energising heaven and earth, indeed the entire world of Prakrti and Jiva, stimulating intelligence, the poetic creator rejoices among the divinities, stars and planets and the senses and mind of humanity. Wearing the cosmic waters as a cloak, inspiring and sanctifying our thoughts and actions, manifesting in all beautiful things, and thus perceived by our senses and apprehended by intelligence, it abides higher and somewhere beyond our apprehension.