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तर॑त्समु॒द्रं पव॑मान ऊ॒र्मिणा॒ राजा॑ दे॒व ऋ॒तं बृ॒हत् । अर्ष॑न्मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्य॒ धर्म॑णा॒ प्र हि॑न्वा॒न ऋ॒तं बृ॒हत् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tarat samudram pavamāna ūrmiṇā rājā deva ṛtam bṛhat | arṣan mitrasya varuṇasya dharmaṇā pra hinvāna ṛtam bṛhat ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तर॑त् । स॒मु॒द्रम् । पव॑मानः । ऊ॒र्मिणा॑ । राजा॑ । दे॒वः । ऋ॒तम् । बृ॒हत् । अर्ष॑त् । मि॒त्रस्य॑ । वरु॑णस्य । धर्म॑णा । प्र । हि॒न्वा॒नः । ऋ॒तम् । बृ॒हत् ॥ ९.१०७.१५

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:107» मन्त्र:15 | अष्टक:7» अध्याय:5» वर्ग:14» मन्त्र:5 | मण्डल:9» अनुवाक:7» मन्त्र:15


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ऊर्मिणा) अपने आनन्द की लहरों से (पवमानः) पवित्र करनेवाला परमात्मा (समुद्रम्) अन्तरिक्षलोक को (तरत्) अवगाहन करता है। (राजा) “राजते प्रकाशत इति राजा”=सबको प्रकाश करनेवाला (देवः) दिव्यस्वरूप (बृहत्, ऋतम्) सर्वोपरि सत्य के धारण करनेवाला परमात्मा (प्रार्षत्) सर्वत्र गतिशील होता है और (मित्रस्य) अध्यापक तथा (वरुणस्य) उपदेशक के (धर्मणा) धर्मों द्वारा (बृहत्, ऋतम्) सर्वोपरि सत्य को (हिन्वानः) प्रेरणा करता हुआ अध्यापक और उपदेशकों द्वारा देश का कल्याण करता है ॥१५॥
भावार्थभाषाः - जिस देश में अध्यापक तथा उपदेशक अपनी शुभ शिक्षा द्वारा लोगों को सुशिक्षित करते हैं, परमात्मा उस देश का अवश्यमेव कल्याण करता है ॥१५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

राजा देव ऋतं बृहत्

पदार्थान्वयभाषाः - (पवमानः) = पवित्र करता हुआ सोम (ऊर्मिणा) = अपने प्रकाश से, सोमरक्षण द्वारा उत्पन्न ज्ञान से (समुद्रं तत्) = [कामो हि समुद्रा उ०] इस अनन्त पार वाले काम को तैर जाता है, हमें वासनाओं से यह ऊपर उठाता है । (राजा) = यह जीवन को दीप्त बनाता है। (देवः) = प्रकाशमय है, दिव्यगुणों का जनक है । (ऋतं बृहत्) = यह हमारे जीवन में उत्कृष्ट ऋत को प्राप्त कराता है । सोमरक्षण से जीवन ऋतमय बनता है। यह सोम (मित्रस्य) = सब के प्रति स्नेह वाले, (वरुणस्य) = द्वेष का निवारण करनेवाले पुरुष के (धर्मणा) = धारण के हेतु से (अर्षन्) = शरीर में गतिवाला होता है। उसके मित्र व वरुण के जीवन में यह (बृहत् ऋतं) = उत्कृष्ट ऋत को जीवन की नियमितता को (हिन्वानः) = प्रेरित करता है, बढ़ाता है। सोमरक्षण से पुरुष 'स्नेह व निद्वेषता' के भावों को धारण करता हुआ बड़े नियमित जीवन वाला होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम सुरक्षित हुआ हुआ हमें वासनाओं से पार ले जाता है, जीवन को 'प्रकाशमय दिव्यगुण सम्पन्न स्नेहयुक्त निर्दोष व ऋतमय' बनाता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ऊर्मिणा) स्वानन्दवीचिभिः (पवमानः) पवित्रयिता परमात्मा (समुद्रम्) अन्तरिक्षलोकं (तरत्) अवगाहते (राजा) सर्वप्रकाशकः (देवः) दिव्यरूपः (बृहत्, ऋतं) सर्वोपरि सत्यताश्रयः परमात्मा (प्रार्षत्) सर्वत्र गतिशीलो भवति (मित्रस्य) अध्यापकस्य (वरुणस्य) उपदेशकस्य च (धर्मणा) धर्मैः (बृहत्, ऋतम्) सर्वोपरि सत्यतां (हिन्वानः) प्रेरयन् ताभ्यां लोककल्याणं वर्धयति ॥१५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Across the ocean of existence, pure, purifying and flowing by waves of ecstasy, refulgent generous divine ruler of life, itself the law of expansive universe, radiating by and with the Dharma of Mitra, spirit of love, and Varuna, spirit of justice, inspiring and stimulating the universal law of truth and advancement, rolls Soma.