तव॑ द्र॒प्सा उ॑द॒प्रुत॒ इन्द्रं॒ मदा॑य वावृधुः । त्वां दे॒वासो॑ अ॒मृता॑य॒ कं प॑पुः ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
tava drapsā udapruta indram madāya vāvṛdhuḥ | tvāṁ devāso amṛtāya kam papuḥ ||
पद पाठ
तव॑ । द्र॒प्साः । उ॒द॒ऽप्रुतः॑ । इन्द्र॑म् । मदा॑य । व॒वृ॒धुः॒ । त्वाम् । दे॒वासः॑ । अ॒मृता॑य । कम् । प॒पुः॒ ॥ ९.१०६.८
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:106» मन्त्र:8
| अष्टक:7» अध्याय:5» वर्ग:10» मन्त्र:3
| मण्डल:9» अनुवाक:7» मन्त्र:8
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (तव, द्रप्साः) तुम्हारी शीघ्र गतिवाली शक्तियें जो (उदप्रुतः) जलों के प्रवाह के समान बहती हैं, वे (इन्द्रं) कर्म्मयोगी के (मदाय) आनन्द के लिये (वावृधुः) बढ़ती हैं और (त्वां) तुम जो (कं) आनन्दस्वरूप हो, इससे (देवासः) विद्वान् लोग (अमृताय) सदा जीवन के लिये (पपुः) पीते हैं ॥८॥
भावार्थभाषाः - ब्रह्मानन्द वा ब्रह्मामृतरूपी रस, जो सब रसों से अधिक स्वादु है, उसका पान ब्रह्मपरायण ज्ञानयोगी और कर्मयोगी ही कर सकते हैं, अन्य नहीं ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
अमृताय कं पपुः
पदार्थान्वयभाषाः - हे सोम ! (तव) = तेरे (द्रप्सा:) = [Drops ] सोमकण (उदप्रुतः) = [आपः रेतो भूत्वा०] रेतस् [शक्ति] को सारे शरीर में प्राप्त करानेवाले हैं। ये (इन्द्रम्) = जितेन्द्रिय पुरुष को (मदाय) = उल्लास के लिये (वावृधुः) = बढ़ाते हैं । इनके रक्षण से जीवन सदा सोत्साह बना रहता है। (देवासः) = देववृत्ति के पुरुष (त्वाम्) = तुझे (अमृताय) = अमृतत्व की प्राप्ति के लिये (कम्) = सुख देनेवाले को (पपुः) = अपने अन्दर ही पीने का प्रयत्न करते हैं। शरीर में सुरक्षित सोम अमृतत्व व सुख का साधन बनता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम 'उल्लास, अमृतत्व व सुख' को देता है ।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (तव, द्रप्साः) भवतः शीघ्रगतिकाः शक्तयः याश्च (उदप्रुतः) जलप्रवाहवत् वहनशीलास्ताः (इन्द्रम्) कर्मयोगिनः (मदाय) आनन्दाय (वावृधुः) वर्धन्ते (कम्) आनन्दमयं (त्वां) भवन्तं (देवासः) विद्वांसः (अमृताय) शाश्वतिकजीवनाय (पपुः) पिबन्ति ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - The streams of your peace, beauty and bliss swell like streams of water in flood, and the divines drink of the ecstasy for the attainment of immortality.
