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प्र ध॑न्वा सोम॒ जागृ॑वि॒रिन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव । द्यु॒मन्तं॒ शुष्म॒मा भ॑रा स्व॒र्विद॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra dhanvā soma jāgṛvir indrāyendo pari srava | dyumantaṁ śuṣmam ā bharā svarvidam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । ध॒न्व॒ । सो॒म॒ । जागृ॑विः । इन्द्रा॑य । इ॒न्दो॒ इति॑ । परि॑ । स्र॒व॒ । द्यु॒ऽमन्त॑म् । शुष्म॑म् । आ । भ॒र॒ । स्वः॒ऽविद॑म् ॥ ९.१०६.४

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:106» मन्त्र:4 | अष्टक:7» अध्याय:5» वर्ग:9» मन्त्र:4 | मण्डल:9» अनुवाक:7» मन्त्र:4


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे सर्वोत्पादक परमात्मन् ! आप (जागृविः) जागरणशील हैं, (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप ! कर्मयोगी के लिये (परिस्रव) आप प्राप्त हों, जो कर्म्मयोगी (द्युमन्तं) दीप्तिवाला (स्वर्विदं) विज्ञानी है, उसको (शुष्मं) बल से (आभर) आप पूर्ण करें और आप (प्रधन्व) कर्म्मयोगी को प्रेरणा करें, ताकि वह संसार की भलाई करे ॥४॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा अपनी शक्तियों से सदैव जागृत है और वह कर्मयोगी को सदैव जागृति देकर सावधान करता है ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

द्युमन्तं शुष्मं

पदार्थान्वयभाषाः - हे (सोम) = वीर्य ! (जागृवि:) = शरीर रक्षण के लिये सदा जागरित तू (प्रधन्व:) = हमें प्रकर्षेण प्राप्त हो । हे (इन्दो) = सोम (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिये (परिस्रव) = शरीर में चारों ओर गतिवाला है। इस प्रकार शरीर में व्याप्त हुआ हुआ तू (द्युमन्तं) = ज्योतिर्मय (शुष्मम्) = शत्रुशोषक बल को (आभरः) = करनेवाला हो। उस बल को जो ('स्वर्विदम्') = स्वयं प्रकाश प्रभु का प्राप्त करानेवाला है (स्वयं राजते । प्रभु की प्राप्ति तभी होती है जब कि हम शरीर में शुष्मतया मस्तिष्क में द्युति को स्थापित कर पाते हैं। इन्हें प्राप्त करानेवाला साधन सोम ही है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम से रक्षित हुए हुए हम 'ब्रह्म + क्षत्र' सम्पन्न हों और इस प्रकार प्रभुदर्शन करनेवाले बनें ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे सर्वोत्पादक परमात्मन् ! भवान् (जागृविः) जागरणशीलोऽस्ति। (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! (इन्द्राय) कर्मयोगिने (परिस्रव) आविर्भूय तं प्राप्नोतु यः कर्मयोगी (द्युमन्तम्) दीप्तिमान् (स्वर्विदं) विज्ञानी तं (शुष्मं) बलेन (आभर) परिपूरयतु (प्रधन्व) तं जगदुपकाराय प्रेरयतु च ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Flow on, O Soma, spirit of divine bliss, ever awake, brilliant and enlightening, streaming on and on for Indra, the soul, bear and bring the light and fire of the sun and vision of heaven.