वांछित मन्त्र चुनें

अ॒स्येदिन्द्रो॒ मदे॒ष्वा ग्रा॒भं गृ॑भ्णीत सान॒सिम् । वज्रं॑ च॒ वृष॑णं भर॒त्सम॑प्सु॒जित् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

asyed indro madeṣv ā grābhaṁ gṛbhṇīta sānasim | vajraṁ ca vṛṣaṇam bharat sam apsujit ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒स्य । इत् । इन्द्रः॑ । मदे॑षु । आ । ग्रा॒भम् । गृ॒भ्णी॒त॒ । सा॒न॒सिम् । वज्र॑म् । च॒ । वृष॑णम् । भ॒र॒त् । सम् । अ॒प्सु॒ऽजित् ॥ ९.१०६.३

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:106» मन्त्र:3 | अष्टक:7» अध्याय:5» वर्ग:9» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:7» मन्त्र:3


0 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सानसिम्) सर्वभजनीय परमात्मा को (ग्राभम्) जो ग्रहण करने के योग्य है (आ) और (वृषणम्) वर्षणशील (वज्रम्) विद्युत् को (संभरत्) बनाता है, (अस्य, इत्) उसी की ही (इन्द्रः) कर्मयोगी (अप्सुजित्) जो सब कामनाओं को वशीभूत करनेवाला है, (गृम्णीत) उपासना को (मदेषु) आनन्द की प्राप्ति के लिये करें ॥३॥
भावार्थभाषाः - कर्मयोगी को चाहिये कि वह एकमात्र परमात्मा की अनन्य भक्ति करे, अन्य किसी की उपासना न करे ॥३॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ग्राभं गृभ्णीत

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रः) = जितेन्द्रिय पुरुष (अस्य इत्) = इस सोम के ही (मदेषु) = उल्लासों में, सोमपान से जनित मद में उस (सानसिम्) = सम्भजनीय (ग्राभम्) = ग्रहीतव्य अथवा सारे संसार को ग्रहण करनेवाले प्रभु को (गृभ्णीत) = ग्रहण करता है। सोमरक्षण से ही प्रभु का दर्शन होता है । (च) = और इस (सोमरक्षण) = जनित मद में (वृषणं) = शक्तिशाली (वज्रं) = क्रियाशीलता रूप वज्र को (संभरत्) = धारण करता है और (अप्सुजित्) = सदा कर्मों में प्रसित हुआ हुआ विजयी होता है । सोमरक्षक शक्तिशाली बनकर क्रियाशील बनता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से ही प्रभु सा ग्रहण होता है। यह सोमी पुरुष क्रियाशील होता है ।
0 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सानसिं) सर्वभजनीयं (ग्राभं) ग्रहणीयं (आ) अथ (वृषणं) वर्षणशीलं (वज्रं, सम्भरत्) विद्युतः कर्त्तारम् (अस्य, इत्) अस्यैव (इन्द्रः) कर्मयोगी (अप्सुजित्) सर्वकामनानां स्ववशीभूतकारकः (मदेषु) आनन्दलाभाय (गृभ्णीत) उपासनां कुर्वीत ॥३॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Under the inspiration and ecstasy of this soma of divine love, let the soul seize the victorious bow, take on the generous virile and mighty bolt of will and power of faith and win the target of the battle of Karma to the attainment of Divinity.