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अ॒स्मभ्यं॑ त्वा वसु॒विद॑म॒भि वाणी॑रनूषत । गोभि॑ष्टे॒ वर्ण॑म॒भि वा॑सयामसि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

asmabhyaṁ tvā vasuvidam abhi vāṇīr anūṣata | gobhiṣ ṭe varṇam abhi vāsayāmasi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒स्मभ्य॑म् । त्वा॒ । व॒सु॒ऽविद॑म् । अ॒भि । वाणीः॑ । अ॒नू॒ष॒त॒ । गोभिः॑ । ते॒ । वर्ण॑म् । अ॒भि । वा॒स॒या॒म॒सि॒ ॥ ९.१०४.४

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:104» मन्त्र:4 | अष्टक:7» अध्याय:5» वर्ग:7» मन्त्र:4 | मण्डल:9» अनुवाक:7» मन्त्र:4


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वसुविदम्) सम्पूर्ण प्रकार के ऐश्वर्य्यों को देनेवाले आपको (अस्मभ्यम्) हमारी (वाणीः) स्तुतिरूप वाणी (अभ्यनूषत) वर्णन करे, (ते) तुम्हारे (वर्णम्) वर्णन को (गोभिः) चित्तवृत्तियों द्वारा (अभिवासयामसि) अपने चित्त में बसायें ॥४॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा अनन्तगुणसम्पन्न है। उसके गुणों के वर्णन को जो पुरुष श्रवण, मनन और निदिध्पासन द्वारा चित्त में बसाते हैं, वे पुरुष अवश्यमेव ज्ञानयोगी बनते हैं ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वसुविदम्

पदार्थान्वयभाषाः - हे सोम! (अस्मभ्यम्) = हमारे लिये (वसुविदं त्वा) = सब वसुओं को प्राप्त करानेवाले तुझको (वाणी:) = स्तुति वाणियाँ (अभि अनूषत) = स्तुत करती हैं। तेरे गुणों का गायन करती हुईं ये वाणियाँ हमें तेरे रक्षण में अधिक और अधिक प्रीतिवाला करती हैं। हम (गोभिः) = इन ज्ञान की वाणियों के द्वारा ते (वर्णं) = तेरे इस चोगे [covering] या आवरण को (अभिवासयामसि) = आच्छादित करते हैं। ज्ञान की वाणियों के अध्ययन में तत्पर रहने पर हम वासनाओं से बचे रहते हैं और सोम को सुरक्षित कर पाते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - खाली समय को ज्ञान प्राप्ति में बिताने से वासनाओं का आक्रमण नहीं होता और सोम के रक्षण का सम्भव होता है।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वसुदिवम्)  विविधैश्वर्यप्रदं भवन्तं (अस्मभ्यम्) अस्माकं (वाणीः)  स्तुतिवाक् (अभ्यनूषत) वर्णयतु  (ते) तव (वर्णं) वर्णनं (गोभिः)  चित्तवृत्तिभिः (अभिवासयामसि) चित्ते वासयाम ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Our songs of adoration celebrate and exalt you as creator, knower and giver of peace, power, wealth and honours of the world. Indeed, with thoughts, words and vision, we glorify your power and presence as it emerges in our experience.