प्र पु॑ना॒नाय॑ वे॒धसे॒ सोमा॑य॒ वच॒ उद्य॑तम् । भृ॒तिं न भ॑रा म॒तिभि॒र्जुजो॑षते ॥
pra punānāya vedhase somāya vaca udyatam | bhṛtiṁ na bharā matibhir jujoṣate ||
प्र । पु॒ना॒नाय॑ । वे॒धसे॑ । सोमा॑य । वचः॑ । उत्ऽय॑तम् । भृ॒तिम् । न । भ॒र॒ । म॒तिऽभिः॑ । जुजो॑षते ॥ ९.१०३.१
आर्यमुनि
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
(पुनानाय) = पवित्र करनेवाले, वेधसे कर्मों के (विधाता सोमाय) = इस सोम के लिये, सोम के रक्षण के लिये (वचः) = स्तुतिवचन (उद्यतम्) = उद्यत हुआ है। प्रभु का स्तवन करने से वृत्ति के ठीक बने रहने के द्वारा सोम का रक्षण होता है । (मतिभिः) = बुद्धियों के द्वारा (जुजोषते) = प्रीणित करनेवाले इस सोम के लिये स्तुति वचनों को इस प्रकार (प्रभर) = धारण कर, (न) = जैसे कि एक कर्मकर्ता के लिये (भृतिम्) = भृति को धारण करते हैं। सोम हमारे लिये बुद्धि का सम्पादन करता है । सो हम सोम का साधन करते हैं।
