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प्र पु॑ना॒नाय॑ वे॒धसे॒ सोमा॑य॒ वच॒ उद्य॑तम् । भृ॒तिं न भ॑रा म॒तिभि॒र्जुजो॑षते ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra punānāya vedhase somāya vaca udyatam | bhṛtiṁ na bharā matibhir jujoṣate ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । पु॒ना॒नाय॑ । वे॒धसे॑ । सोमा॑य । वचः॑ । उत्ऽय॑तम् । भृ॒तिम् । न । भ॒र॒ । म॒तिऽभिः॑ । जुजो॑षते ॥ ९.१०३.१

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:103» मन्त्र:1 | अष्टक:7» अध्याय:5» वर्ग:6» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:6» मन्त्र:1


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोमाय) सर्वोत्पादक (वेधसे) जो सबका विधाता परमात्मा है, (पुनानाय) सबको पवित्र करनेवाला है, (जुजोषते) जो शुभकर्मों में युक्त करनेवाला है, उसके लिये (मतिभिः) हमारी भक्तिरूपी (वचः) वाणी स्तुतियों के द्वारा (उद्यतम्) उद्यत हो और उक्त परमात्मा (भृतिम्) भृत्य के (न) समान हमें (प्रभर) ऐश्वर्य्य से परिपूर्ण करे ॥१॥
भावार्थभाषाः - जो लोग परमात्मपरायण होते हैं, परमात्मा उन्हें अवश्यमेव ऐश्वर्य्यों से भरपूर करता है, वा यों कहो कि जिस प्रकार स्वामी भृत्य को भृति देकर प्रसन्न होता है, इसी प्रकार परमात्मा अपने उपासकों का भरण-पोषण करके उन्हें उन्नतिशील बनाता है ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

(पुनानाय) = पवित्र करनेवाले, वेधसे कर्मों के (विधाता सोमाय) = इस सोम के लिये, सोम के रक्षण के लिये (वचः) = स्तुतिवचन (उद्यतम्) = उद्यत हुआ है। प्रभु का स्तवन करने से वृत्ति के ठीक बने रहने के द्वारा सोम का रक्षण होता है । (मतिभिः) = बुद्धियों के द्वारा (जुजोषते) = प्रीणित करनेवाले इस सोम के लिये स्तुति वचनों को इस प्रकार (प्रभर) = धारण कर, (न) = जैसे कि एक कर्मकर्ता के लिये (भृतिम्) = भृति को धारण करते हैं। सोम हमारे लिये बुद्धि का सम्पादन करता है । सो हम सोम का साधन करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - भावार्थ - प्रभु स्तवन द्वारा सोम का रक्षण करें। रक्षित सोम हमें पवित्र करता है, हमारे जीवन में यह विधाता के समान होता है, हमें बुद्धियों से युक्त करता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोमाय) सर्वोत्पादकाय (वेधसे) जगतः कर्त्रे (पुनानाय) सर्वस्य पावका (जुजोषते) शुभकर्मणि योजकाय परमात्मने (मतिभिः) भक्त्या मम स्तुतिभिः (वचः) वाक् (उद्यतम्) उद्यता भवतु। (भृतिं, न) भृत्यमिव मां स परमात्मा (प्रभर) भरतु ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Sing rising songs of adoration in honour of Soma, pure and purifying, omniscient and inspiring ordainer of life, and offer the songs as homage of yajnic gratitude. Soma feels pleased with enlightened songs of love and faith.