सशक्त शरीर व दीप्त मस्तिष्क
पदार्थान्वयभाषाः - (यद्) = जब (यज्ञम्) = श्रेष्ठतम कर्मों को (आनुषक्) = निरन्तर (तन्वानाः) = विस्तृत करते हुए यज्ञशील लोग (अञ्जते) = सोम से अपने को अलंकृत करते हैं, तो यह सोम उन द्यावापृथिवी को, मस्तिष्क व शरीर को (त्मना) = स्वयं (अभि) = [गच्छति] प्राप्त होता है, जो समीचीने परस्पर संगत हैं, यही महान् हैं और (ऋतस्य मातरा) = ऋत का निर्माण करनेवाले हैं। सोम शक्ति से परिपुष्ट मस्तिष्क और शरीर ऋत अर्थात् यज्ञ आदि उत्तम कर्मों का ही निर्माण करते हैं। मनुष्य निरन्तर यज्ञादि कर्मों में लगा रहे तो वासनाओं से बचा रहता है। इस प्रकार यह सोमरक्षण के योग्य बनता है। सुरक्षित सोम मस्तिष्क व शरीर दोनों का पोषण करता है। सोम से शरीर सशक्त बनता है तो मस्तिष्क दीप्त। यही दोनों का संगत होना है। सशक्त शरीर व दीप्त मस्तिष्क मनुष्य को महान् बनाते हैं। ये जीवन को अनृत से दूर करके ऋतमय बनाते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-यज्ञों में लगे रहकर वासनाओं से अनाक्रान्त हम सोम का रक्षण करते हैं। यह हमारे मस्तिष्क व शरीर को दीप्त व सशक्त बनाकर महान् बनाता है ।