यमी॒ गर्भ॑मृता॒वृधो॑ दृ॒शे चारु॒मजी॑जनन् । क॒विं मंहि॑ष्ठमध्व॒रे पु॑रु॒स्पृह॑म् ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
yam ī garbham ṛtāvṛdho dṛśe cārum ajījanan | kavim maṁhiṣṭham adhvare puruspṛham ||
पद पाठ
यम् । ई॒म् इति॑ । गर्भ॑म् । ऋ॒त॒ऽवृधः॑ । दृ॒शे । चारु॑म् । अजी॑जनन् । क॒विम् । मंहि॑ष्ठम् । अ॒ध्व॒रे । पु॒रु॒ऽस्पृह॑म् ॥ ९.१०२.६
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:102» मन्त्र:6
| अष्टक:7» अध्याय:5» वर्ग:5» मन्त्र:1
| मण्डल:9» अनुवाक:6» मन्त्र:6
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (ऋतवृधः) यज्ञकर्म्म में कुशल विद्वान् (यमीम्) जिस उक्त परमात्मा के (गर्भं) ज्ञानरूप गर्भ को धारण करते हैं, (दृशे) संसार के प्रकाश के लिये उससे (चारुं) सुन्दर सन्तान को (अजीजनन्) उत्पन्न करते हैं, वह परमात्मा (कविं) सर्वज्ञ (मंहिष्ठं) अत्यन्त पूजनीय और (पुरुस्पृहं) सबका उपास्यदेव है, (अध्वरे) ज्ञानयज्ञों में उक्त परमात्मा उपासनीय है ॥६॥
भावार्थभाषाः - जो इस चराचर ब्रह्माण्ड का उत्पादक परमात्मा है, उसकी उपासना ज्ञानयज्ञ, योगयज्ञ, तपोयज्ञ इत्यादि अनन्त प्रकार के यज्ञों द्वारा की जाती है ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
कविं महिष्ठम्
पदार्थान्वयभाषाः - (यम्) = जिस सोम को (ई) = निश्चय से (ऋतावृधः) = ऋत का अपने अन्दर वर्धन करनेवाले लोग (गर्भम्) = गर्भ के रूप में (अजीजनन्) = उत्पन्न करते हैं। शरीर के अन्दर ही स्थित हुआ हुआ यह सोम (दृशे चारुम्) = दर्शन के लिये अत्यन्त सुन्दर होता है । सोमरक्षण से शरीर तेजस्वी होकर दर्शनीय बन जाता है । उस सोम को ये अपने अन्दर गर्भरूप से करते हैं, जो (किवम्) = उनको क्रान्तदर्शी बनाता है, (महिष्ठम्) = अधिक से अधिक ऐश्वर्यों का देनेवाला है। अतएव (अध्वरे) = इस जीवमय यज्ञ में (पुरुस्पृहम्) = अत्यन्त स्पहणीय है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-व्यवस्थित जीवन से हम सोम का रक्षण करते हैं। यह सोम हमारे जीवन को दर्शनीय व सुन्दर बनाता है।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (ऋतवृधः) यज्ञकर्मसु कुशला विद्वांसः (यम्, ईम्) यस्य परमात्मनः (गर्भम्) ज्ञानरूपगर्भं दधति (दृशे) लोकप्रकाशाय तेन (चारुम्) सुन्दरसन्तानम् (अजीजनन्) उत्पादयन्ति, स परमात्मा (कविम्) सर्वज्ञः (मंहिष्ठम्) पूजनीयतमः (पुरुस्पृहम्) सर्वोपास्यः (अध्वरे) ज्ञानयज्ञे चोपास्यः ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - To realise and reveal that divine treasure origin of the world and its glory, sages and divines, celebrating his law, truth and yajnic evolution, love and join the presence of Soma, great and glorious, poetic creator, mighty generous, universally adored, and manifesting anew in the world of love and beauty.
