तं दु॒रोष॑म॒भी नर॒: सोमं॑ वि॒श्वाच्या॑ धि॒या । य॒ज्ञं हि॑न्व॒न्त्यद्रि॑भिः ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
taṁ duroṣam abhī naraḥ somaṁ viśvācyā dhiyā | yajñaṁ hinvanty adribhiḥ ||
पद पाठ
तम् । दु॒रोष॑म् । अ॒भि । नरः॑ । सोम॑म् । वि॒श्वाच्या॑ । धि॒या । य॒ज्ञम् । हि॒न्व॒न्ति॒ । अद्रि॑ऽभिः ॥ ९.१०१.३
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:101» मन्त्र:3
| अष्टक:7» अध्याय:5» वर्ग:1» मन्त्र:3
| मण्डल:9» अनुवाक:6» मन्त्र:3
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (तम्) पूर्वोक्त (दुरोषम्) अखण्डनीय परमात्मा को (नरः) नेता लोग (अद्रिभिः) चित्तवृत्तियों द्वारा (अभिहिन्वन्ति) साक्षात्कार करते हैं, जो परमात्मा (यज्ञम्) यज्ञरूप है और (सोमम्) सर्वोत्पादक है, उसको (विश्वाच्या, धिया) विचित्र बुद्धि से साक्षात्कार करते हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा को वेद में यज्ञ शब्द से कथन किया गया है, जैसा कि “तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे” वर्णन किया है कि सर्वपूज्य परमात्मा से ऋगादि चारों वेद प्रगट हुए, इसी अभिप्राय से यहाँ भी परमात्मा को यज्ञरूप से वर्णन किया है ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
दुरोषं सोमं
पदार्थान्वयभाषाः - (नर:) = उन्नतिपथ पर चलनेवाले मनुष्य (तं सोमम्) = उस सोम को (अद्रिभिः) = [adore] उपासनाओं के द्वारा (यज्ञं अभिहिन्वन्ति) = इस जीवन यज्ञ की ओर प्रेरित करते हैं। उपासना के द्वारा सोम सुरक्षित रहता है, वही वस्तुतः जीवन को यज्ञमय बनाता है। उस सोम को ये सुरक्षित करते हैं जो (दुरोषम्) = सब बुराइयों का दहन करनेवाला है। इसलिये इसका रक्षण करते हैं कि (विश्वाच्या धिया) = सम्पूर्ण ज्ञान को प्राप्त करानेवाली [विश्वं ज्ञानं अंचित्या] बुद्धि के हेतु से । सुरक्षित सोम बुद्धि की तीव्रता व सूक्ष्मता का हेतु बनता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - उपासना द्वारा सुरक्षित सोम बुराइयों को दग्ध करके हमें उस तीव्र बुद्धि से प्राप्त कराता है जो सब ज्ञानविज्ञान का ग्रहण करनेवाली होती है।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (तम्) पूर्वोक्तम् (दुरोषं) अखण्डनीयं परमात्मानं (नरः) नेतारः (अद्रिभिः) चित्तवृत्तिभिः (अभि हिन्वन्ति) साक्षात्कुर्वन्ति (यज्ञं) यो यज्ञरूपोऽस्ति (सोमं) सर्वोत्पादकश्च तं (विश्वाच्या, धिया) विचित्रबुद्ध्या साक्षात्कुर्वन्ति ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - That blazing unassailable Soma, adorable in yajna, leading lights invoke and impel with universal thought and speech, with controlled mental reflection for self-realisation.
