वांछित मन्त्र चुनें

त्वां रि॑हन्ति मा॒तरो॒ हरिं॑ प॒वित्रे॑ अ॒द्रुह॑: । व॒त्सं जा॒तं न धे॒नव॒: पव॑मान॒ विध॑र्मणि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvāṁ rihanti mātaro harim pavitre adruhaḥ | vatsaṁ jātaṁ na dhenavaḥ pavamāna vidharmaṇi ||

पद पाठ

त्वाम् । रि॒ह॒न्ति॒ । मा॒तरः॑ । हरि॑म् । प॒वित्रे॑ । अ॒द्रुहः॑ । व॒त्सम् । जा॒तम् । न । धे॒नवः॑ । पव॑मान । विऽध॑र्मणि ॥ ९.१००.७

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:100» मन्त्र:7 | अष्टक:7» अध्याय:4» वर्ग:28» मन्त्र:2 | मण्डल:9» अनुवाक:6» मन्त्र:7


0 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पवमान) हे सबको पवित्र करनेवाले परमात्मन् ! (विधर्मणि) नाना प्रकार के ज्ञानों को धारण करनेवाले ज्ञानयज्ञ में (त्वां) तुमको (अद्रुहः) राग-द्वेष से रहित विज्ञानी लोग (रिहन्ति) आस्वादन करते हैं, (न) जैसे कि (धेनवः) गौएँ (जातं) उत्पन्न हुए (वत्सं) वत्स का आस्वादन करती हैं, इसी प्रकार (हरिं) हरिरूप परमात्मा को सब लोग प्रेम से ग्रहण करते हैं ॥७॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा की प्राप्ति का सर्वोपरि साधन प्रेम है ॥७॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

विधर्मणि

पदार्थान्वयभाषाः - हे (पवमान) = जीवन को पवित्र बनानेवाले सोम ! (त्वाम्) = तुझ (हरिम्) = दुःखों व रोगों के हरण करनेवाले को (मातर:) = जीवन का निर्माण करनेवाले, (अद्रुहः) = द्रोह की भावना से रहित पुरुष (रिहन्ति) = आस्वादित करते हैं। अर्थात् तेरे रक्षण में एक अद्भुत आनन्द का अनुभव करते हैं । हे सोम ! (विधर्मणि) = विशिष्ट धारणात्मक कार्य के निमित्त तेरा इस प्रकार ये आस्वादन करते हैं, (न) = जैसे कि (जातं वत्सम्) = उत्पन्न हुए हुए बछड़े को (धेनवः) = नव सूतिका गौ चाटती दिखती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण के लिये अद्रोह आवश्यक है। रक्षित सोम ही धारण करता है ।
0 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पवमान) हे सर्वपावक ! (विधर्मणि) विविधज्ञानवति ज्ञानयज्ञे (त्वां) भवन्तं (अद्रुहः) द्रोहरहिता विज्ञानिनः (रिहन्ति) आस्वादयन्ति (न) यथा (धेनवः) गावः (जातं, वत्सं) उत्पन्नं सुतमास्वादयन्ति एवं हि (हरिं) परमात्मानमपि सर्वे प्रेम्णा गृह्णन्ति ॥७॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Soma, pure and purifying saviour spirit of universal sanctity, just as mother cows love and caress a new born calf, so do the motherly forces of nature and humanity free from the negativities of malice and jealousy love and cherish you arising in the heart and inspiring the soul in various dharmic situations of life.