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अ॒भी न॑वन्ते अ॒द्रुह॑: प्रि॒यमिन्द्र॑स्य॒ काम्य॑म् । व॒त्सं न पूर्व॒ आयु॑नि जा॒तं रि॑हन्ति मा॒तर॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

abhī navante adruhaḥ priyam indrasya kāmyam | vatsaṁ na pūrva āyuni jātaṁ rihanti mātaraḥ ||

पद पाठ

अ॒भि । न॒व॒न्ते॒ । अ॒द्रुहः॑ । प्रि॒यम् । इन्द्र॑स्य । काम्य॑म् । व॒त्सम् । न । पूर्वे॑ । आयु॑नि । जा॒तम् । रि॒ह॒न्ति॒ । मा॒तरः॑ ॥ ९.१००.१

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:100» मन्त्र:1 | अष्टक:7» अध्याय:4» वर्ग:27» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:6» मन्त्र:1


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (न) जैसे कि (पूर्वे) प्रथम (आयुनि) उमर में (जातं) उत्पन्न हुए (वत्सं) वत्स को (मातरः) गौएँ (रिहन्ति) आस्वादन करतीं हैं, इसी प्रकार (अद्रुहः) राग-द्वेष से रहित पुरुष (इन्द्रस्य) कर्म्मयोगी के (काम्यं) कमनीय (प्रियं) सबसे प्यारे कर्म्मयोगी को (अभिनवन्ते) प्रेमभाव से प्राप्त होते हैं ॥१॥
भावार्थभाषाः - अभ्युदय की इच्छा करनेवाले मनुष्य को कर्मयोगी ही सबसे प्रिय मानना चाहिये ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अद्रुहः- मातरः

पदार्थान्वयभाषाः - (अद्रुहः) = द्रोह की वृत्ति से रहित पुरुष (प्रियम्) = इस प्रीति के जनक (इन्द्रस्य काम्यम्) = जितेन्द्रिय पुरुष से चाहने के योग्य इस सोम को (अभिनवन्ते) = प्राप्त होते हैं, इसकी ओर जाते हैं । हृदयों में द्रोह व वैर आदि की भावनायें सोमरक्षण के लिये अनुकूल नहीं होती। (पूर्वे आयुनि) = जीवन के प्रारम्भ में जीवन के प्रारम्भिक भाग अर्थात् ब्रह्मचर्याश्रम में (मातरः) = अपने जीवन का निर्माण करनेवाले व्यक्ति (जातम्) = उत्पन्न हुए हुए इस सोम को (रिहन्ति) = इस प्रकार आस्वादित करते हैं (न) = जैसे कि उत्पन्न हुए हुए (वत्सम्) = बछड़े को (मातरः) = धेनुएँ चाटती हैं। धेनुओं का वत्सों के प्रति जैसा प्रेम होता है, इसी प्रकार सोम के प्रति उन व्यक्तियों का प्रेम होता है, जो अपने जीवन का निर्माण करनेवाले होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-द्रोह शून्यता सोमरक्षण के लिये आवश्यक है। जीवन का निर्माण करनेवाले व्यक्ति सोम का रक्षण करते हैं।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (न) यथा (पूर्वे, आयुनि) पूर्वे वयसि (जातं, वत्सं) उत्पन्नं सुतं (मातरः) गावः (रिहन्ति) आस्वादयन्ति, एवं (अद्रुहः) द्रोहरहिता लोकाः (इन्द्रस्य) कर्मयोगिने (काम्यं) कमनीयं (प्रियं) सर्वप्रियं कर्मयोगं (अभि नवन्ते) प्रेम्णा लभन्ते ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Just as young mothers love and caress the first bom baby in early age, so do people free from malice and jealousy take to Soma, meditative realisation of divinity, dear favourite love of Indra, the soul.