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अ॒भि प्रि॒या दि॒वस्प॒दम॑ध्व॒र्युभि॒र्गुहा॑ हि॒तम् । सूर॑: पश्यति॒ चक्ष॑सा ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

abhi priyā divas padam adhvaryubhir guhā hitam | sūraḥ paśyati cakṣasā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒भि । प्रि॒या । दि॒वः । प॒दम् । अ॒ध्व॒र्युऽभिः॑ । गुहा॑ । हि॒तम् । सूरः॑ । प॒श्य॒ति॒ । चक्ष॑सा ॥ ९.१०.९

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ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:10» मन्त्र:9 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:35» मन्त्र:4 | मण्डल:9» अनुवाक:1» मन्त्र:9


आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सूरः) “सरति ज्ञानद्वारेण सर्वत्र प्राप्नोतीति सूरो विद्वान्” विद्वान् (अभि, प्रिया) जो सब का प्यारा है, वह (अध्वर्युभिः) अध्वर्यु आदि ऋत्विजों से जो (गुहा, हितम्) यज्ञरूपी गुहा में निहित है और (दिवस्पदम्) जो द्युलोक का भी आधिकरणरूपी पद है, उसको (चक्षसा) ज्ञानदृष्टि से (पश्यति) देखता है ॥९॥
भावार्थभाषाः - जो इस संसाररूपी गुहा में स्थिर सूक्ष्म से अति सूक्ष्म परमात्मा है और जो भ्वादि लोकों का एकमात्र अधिकरण है, उस को आत्मज्ञानी विद्वान् ही जान सकते हैं, अन्य नहीं ॥९॥३५॥ यह दशवाँ सूक्त और पैतीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रकाशमय प्रभु के पद का दर्शन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सूरः) = ' सुवीर्य इन्द्र: ' सोमरक्षण के द्वारा उत्तम वीर्यवाला इन्द्र (प्रिया चक्षसा) = प्रिय- प्रीणित करनेवाली दृष्टिशक्ति से (दिवः पदम्) = उस प्रकाशमय प्रभु के पद को (अभिपश्यति) = देखता है । सोमरक्षण के द्वारा दृष्टिशक्ति सूक्ष्म बनती है। उस दृष्टि से सर्वत्र प्रभु की महिमा का दर्शन होता है । [२] यह प्रभु का पद (अध्वर्युभिः) = यज्ञशील पुरुषों के द्वारा (गुहा हितम्) = बुद्धिरूपी गुहा में स्थापित होता है । यज्ञशील पुरुष अपनी बुद्धि में उस प्रभु के प्रकाश को देखता है। इसी प्रकाश को सोमरक्षक इन्द्र अपनी सूक्ष्म दृष्टि से देखता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से सूक्ष्म दृष्टि व तीव्र बुद्धि बनकर हम प्रभु का दर्शन करते हैं, यह प्रभु यज्ञशील पुरुषों के द्वारा बुद्धि रूप गुहा में स्थापित किये जाते हैं । अगले सूक्त में भी इसी सोम की महिमा का प्रतिपादन है-

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सूरः) विद्वान् (अभि, प्रिया) सर्वेषाम्प्रियः (अध्वर्युभिः) अध्वर्य्वादिऋत्विग्भिः यत् (गुहा, हितम्) यज्ञात्मकगुहायां निहितमस्ति तथा च (दिवस्पदम्) द्युलोकस्यापि आश्रयरूपेण पदमस्ति तत् (चक्षसा) ज्ञानदृष्ट्या (पश्यति) अवलोकते ॥९॥ इति दशमं सूक्तं पञ्चत्रिंशत्तमो वर्गश्च समाप्तः ॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The brave visionary of soma creativity sees the heavenly light and the vision of the light giver, distilled, concentrated and treasured in the core of the heart by the performers of soma yajna.