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तमी॒मण्वी॑: सम॒र्य आ गृ॒भ्णन्ति॒ योष॑णो॒ दश॑ । स्वसा॑र॒: पार्ये॑ दि॒वि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tam īm aṇvīḥ samarya ā gṛbhṇanti yoṣaṇo daśa | svasāraḥ pārye divi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तम् । ई॒म् । अण्वीः॑ । स॒ऽम॒र्ये । आ । गृ॒भ्णन्ति॑ । योष॑णः । दश॑ । स्वसा॑रः । पार्ये॑ । दि॒वि ॥ ९.१.७

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:1» मन्त्र:7 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:17» मन्त्र:2 | मण्डल:9» अनुवाक:1» मन्त्र:7


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (तं) उस पुरुष को (समर्ये) ज्ञानयज्ञ में (आ) भली प्रकार (गृभ्णन्ति) ग्रहण करती हैं (दश) दश सख्यावाली (स्वसारः) स्वयंगतिशील (योषणः) वृत्तियें, जो (अण्वीः) अति सूक्ष्म हैं (पार्ये दिवि) प्रकाशरूप ज्ञान के भाव में दश धर्म्म के स्वरूप उसे आकर प्राप्त होते हैं ॥७॥
भावार्थभाषाः - जो पुरुष श्रद्धा के भावों से युक्त होता है, उसे धृति, क्षमा, दम, स्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, धी, विद्या, सत्य और अक्रोध, ये धर्म्म के दश रूप आकर प्राप्त होते हैं। तात्पर्य्य यह है कि वेदशास्त्र और ईश्वर पर श्रद्धा रखनेवाले पुरुष को ही धार्मिक भाव आकर प्राप्त होते हैं, अन्य को नहीं ॥७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अण्वी तथा योषण: [दश]

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (तम्) = उस सोम को (ईम्) = निश्चय से (अण्वीः) = सूक्ष्म बुद्धियाँ तथा (दश योषण:) = दसों इन्द्रियाँ (समर्ये) = [समर्यं संग्रामनाम नि० २ । १७] वासनाओं के साथ संग्राम में (आगृभ्णन्ति) = सर्वथा ग्रहण करती हैं। 'सोम का रक्षण बुद्धि व इन्द्रियों से होता है' इसका अभिप्राय यही है कि सोम का व्यय बुद्धि की दीप्ति व इन्द्रियों की शक्ति के वर्धन में होकर उसका अपव्यय नहीं होता । इन्द्रियों को यहाँ ‘योषण:' कहा है 'यु मिश्रणामिश्रणयोः ' बुराइयों को अपने से अलग करनेवाली तथा अच्छाइयों को अपने से मिलानेवाली ये इन्द्रियाँ सोम से ही शक्ति-सम्पन्न बनती हैं। [२] ये बुद्धियाँ व इन्द्रियाँ (स्वसारः) - आत्मतत्त्व की ओर चलनेवाली होती हैं [स्व+सृ] तथा उस (दिवि) = ज्ञान प्रकाश में स्थित होती हैं जो कि (पार्टी) = हमें भवसागर से पार करने का साधन बनता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम स्वाध्याय के द्वारा बुद्धि को सूक्ष्म बनाने का प्रयत्न करें । इन्द्रियों को ज्ञान प्राप्ति व यज्ञों में व्यापृत रखें। इस प्रकार सोम का रक्षण करते हुए इस उत्कृष्ट ज्ञान को प्राप्त करें, विषयों से ऊपर उठें और प्रभु को प्राप्त करें ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (तम्) तं पुरुषम् (समर्ये) ज्ञानयज्ञे (आगृभ्णन्ति) सुष्ठु गृह्णन्ति (दश) दशसङ्ख्याकाः (स्वसारः) स्वयंगतिशीलाः (योषणः) वृत्तयो याः (अण्वीः) अतिसूक्ष्माः सन्ति। (पार्ये दिवि) प्रकाशरूपे ज्ञानभावे दश धर्मस्वरूपाणि तं प्राप्नुवन्ति ॥७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - That soma, sanctified by the dawn in the holy congregation of peaceful life yajna, ten fine and youthful sisterly senses and pranic energies receive and absorb for the achievement of the light of salvation.