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देवता: इन्द्र: ऋषि: नृमेधः छन्द: पङ्क्तिः स्वर: पञ्चमः

अनु॑ ते॒ शुष्मं॑ तु॒रय॑न्तमीयतुः क्षो॒णी शिशुं॒ न मा॒तरा॑ । विश्वा॑स्ते॒ स्पृध॑: श्नथयन्त म॒न्यवे॑ वृ॒त्रं यदि॑न्द्र॒ तूर्व॑सि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

anu te śuṣmaṁ turayantam īyatuḥ kṣoṇī śiśuṁ na mātarā | viśvās te spṛdhaḥ śnathayanta manyave vṛtraṁ yad indra tūrvasi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अनु॑ । ते॒ । शुष्म॑म् । तु॒रय॑न्तम् । ई॒य॒तुः॒ । क्षो॒णी इति॑ । शिशु॑म् । न । मा॒तरा॑ । विश्वाः॑ । ते॒ । स्पृधः॑ । श्न॒थ॒य॒न्त॒ । म॒न्यवे॑ । वृ॒त्रम् । यत् । इ॒न्द्र॒ । तूर्व॑सि ॥ ८.९९.६

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:99» मन्त्र:6 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:3» मन्त्र:6 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:6


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु के बल का अनुगमन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = सर्वशक्तिमन् प्रभो! (ते) = आपके (तुरयन्तं शुष्मम्) = शत्रुओं का संहार करनेवाले बल का (क्षोणी) = द्यावापृथिवी (अनु ईयतुः) = अनुगमन करते हैं। (न) = जैसे (मातरा शिशुम्) = माता-पिता प्रेमवश छोटे बच्चे के पीछे-पीछे चलते हैं। [२] (ते मन्यवे) = आपके क्रोध के लिये (विश्वाः स्पृधः) = सब शत्रु - सैन्य (श्रथयन्त) = श्रथित व खिन्न हो जाते हैं। (यद्) = जब आप (वृत्रं तूर्वसि) = वृत्र को, ज्ञान के आवरणभूत 'काम' को विध्वस्त करते हैं । उस समय शत्रु सैन्य ढीले पड़ जाते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु की शक्ति का ही सम्पूर्ण संसार अनुगमन करता है। प्रभु के मन्यु के सामने सब शत्रु शिथिल हो जाते हैं। प्रभु ही वृत्र का विनाश करते हैं।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Just as mothers follow the desires and interests of children, so do the heaven and earth, all living beings from earth to heaven, think and act in conformity with you, evil destroying power. All oppositions slacken and fall exhausted when you strike and destroy the demons of evil and negativity in the interest of man.