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देवता: इन्द्र: ऋषि: नृमेधः छन्द: पङ्क्तिः स्वर: पञ्चमः

अन॑र्शरातिं वसु॒दामुप॑ स्तुहि भ॒द्रा इन्द्र॑स्य रा॒तय॑: । सो अ॑स्य॒ कामं॑ विध॒तो न रो॑षति॒ मनो॑ दा॒नाय॑ चो॒दय॑न् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

anarśarātiṁ vasudām upa stuhi bhadrā indrasya rātayaḥ | so asya kāmaṁ vidhato na roṣati mano dānāya codayan ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अन॑र्शऽरातिम् । व॒सु॒ऽदाम् । उप॑ । स्तु॒हि॒ । भ॒द्राः । इन्द्र॑स्य । रा॒तयः॑ । सः । अ॒स्य॒ । काम॑म् । वि॒ध॒तः । न । रो॒ष॒ति॒ । मनः॑ । दा॒नाय॑ । चो॒दय॑न् ॥ ८.९९.४

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:99» मन्त्र:4 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:3» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:4


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'अनर्शराति वसुदा' प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] उस (आनर्शरातिम्) = निष्पाप दानवाले [ A sinless doner] (वसुदाम्) = धनों के दाता प्रभु को (उपस्तुहि) = स्तुत कर । (इन्द्रस्य) = परमैश्वर्यशाली प्रभु के (रातयः) = दान (भद्राः) कल्याणकर हैं। [२] (सः) = वे प्रभु (अस्य विधतः) = प्रभु की पूजा करनेवाले की, उपासक की (कामम्) = कामना को (न रोषति) = हिंसित नहीं करते। ये प्रभु (मनः) = उपासक के मन को (दानाय चोदयन्) = दान के लिये प्रेरित करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम उस वसुओं के देनेवाले प्रभु का स्तवन करें। प्रभु स्तोता की कामना को पूर्ण करते ही हैं। प्रभु हमारे मनों को दान के लिये प्रेरित करते हैं।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Adore and meditate on Indra, giver of wealth, honour, excellence and bliss. Infinite is his generosity, unsatiating, auspicious his gifts. He does not displease the devotee, does not hurt his desire and prayer, he inspires his mind for the reception of divine gifts.