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वि॒भ्राज॒ञ्ज्योति॑षा॒ स्व१॒॑रग॑च्छो रोच॒नं दि॒वः । दे॒वास्त॑ इन्द्र स॒ख्याय॑ येमिरे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vibhrājañ jyotiṣā svar agaccho rocanaṁ divaḥ | devās ta indra sakhyāya yemire ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वि॒ऽभ्राज॑न् । ज्योति॑षा । स्वः॑ । अग॑च्छः । रो॒च॒नम् । दि॒वः । दे॒वाः । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । स॒ख्याय॑ । ये॒मि॒रे॒ ॥ ८.९८.३

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:98» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:1» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:3


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

नियम-बन्धन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो! आप (ज्योतिषा विभ्राजन्) = ज्योति से दीप्त होते हुए (स्वः) = सुख को (अगच्छ:) = प्राप्त होते हैं, आप आनन्दस्वरूप हैं। आप ही (दिवः) = आदित्य के (रोचनम्) = प्रकाशक तेज को प्राप्त कराते हैं। [२] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (देवा:) = देववृत्ति के पुरुष (ते) = आपकी (सख्याय) = मित्रता के लिये (येमिरे) = अपने को नियमों के बन्धन में बाँधते हैं। यह संयम ही उन देवों को महादेव का मित्र बनाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु ज्योति से दीप्त व आनन्दमय हैं, ये सूर्य को भी दीप्ति प्राप्त कराते हैं। संयम के द्वारा देव प्रभु मैत्री के पात्र बनते हैं।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Refulgent with your own light you pervade the regions of bliss and beatify the glory of heaven. Indra, the lights and divinities of the world vye and struggle for friendship with you.