पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (शक्र) = सर्वशक्तिमन् ! (वृत्रहन्) = सब ज्ञान की आवरणभूत वासनाओं को विनष्ट करनेवाले प्रभो ! (यत्) = क्योंकि आप (परावति) = दूर से दूर देश में भी हैं और (यत्) = क्योंकि (अर्वावति) = समीप से समीप देश में भी है [तद् दूरे तद्वन्तिके, तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यत: ], (अत:) = इसीलिए उन सर्वव्यापक (त्वा) = आपको (द्युगत्) = यह ज्ञान - ज्योति में चलनेवाला (सुतावान्) = सोम का शरीर में सम्पादन करनेवाला पुरुष (केशिभिः) = ज्ञान की रश्मियोंवाली (गीर्भिः) = स्तुति-वाणियों से (आविवासति) = पूजता है, परिचरित करता है। [२] आपकी सर्वव्यापकता का स्मरण ही इसे भोगमार्ग में फँसने से बचाता है और ज्ञान के मार्ग पर चलने में प्रवृत्त करता है। इस मार्ग पर चलता हुआ यह भी 'शक्र व वृत्रहा' बनने का प्रयत्न करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु सर्वव्यापक हैं। यह सर्वव्यापकता का स्मरण हमें ज्ञानमार्ग पर चलते हुए, , शक्तिशाली व वासनाओं का विनाशक बनाये।