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य इ॑न्द्र॒ सस्त्य॑व्र॒तो॑ऽनु॒ष्वाप॒मदे॑वयुः । स्वैः ष एवै॑र्मुमुर॒त्पोष्यं॑ र॒यिं स॑नु॒तर्धे॑हि॒ तं तत॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ya indra sasty avrato nuṣvāpam adevayuḥ | svaiḥ ṣa evair mumurat poṣyaṁ rayiṁ sanutar dhehi taṁ tataḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यः । इ॒न्द्र॒ । सस्ति॑ । अ॒व्र॒तः । अ॒नु॒ऽस्वाप॑म् । अदे॑वऽयुः । स्वैः । सः । एवैः॑ । मु॒मु॒र॒त् । पोष्य॑म् । र॒यिम् । स॒नु॒तः । धे॒हि॒ । तम् । ततः॑ ॥ ८.९७.३

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:97» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:36» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:3


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

निद्रालु 'अव्रतः अदेवयु' के धन का नाश

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (यः सस्ति) = जो सोता है, (अव्रतः) = अपने नियमित कर्मों को नहीं करता है। और (अनुष्वापम्) = निद्रा व आलस्य के साथ-साथ (अदेवयुः) = दिव्य गुणों को अपने साथ जोड़ने की कामना से रहित होता है। (सः) = वह (स्वैः एवैः) = अपने ही आचरणों से (पोष्यं रयिम्) = पोषण योग्य जन [सन्तान] व धन का (मुमुरत्) = नाश कर लेता है। [२] हे प्रभो ! (ततः) = उस व्यक्ति से (तम्) = उस रयि को, उस धन को (सनुतः धेहि) = अन्तर्हित करके ही धारण करिये। इसे उस धन से वञ्चित करिये।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम आलस्य में सोये न रहें। प्रबुद्ध होकर व्रतमय जीवनवाले व दिव्य गुणों की प्राप्ति की कामनावाले बनें। यही ऐश्वर्य भाजन बनने का मार्ग है।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of wealth, honour and excellence, he, the hoarder and wastour, who lies idle lost in deep sleep, having forgotten divinity, gratitude and the law of divinity, he destroys that wealth by his own actions and behaviour, though that wealth, otherwise, deserves to be used and developed. Better it is you vest that wealth away from him, elsewhere so that it could be creatively used and developed.