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ति॒ग्ममायु॑धं म॒रुता॒मनी॑कं॒ कस्त॑ इन्द्र॒ प्रति॒ वज्रं॑ दधर्ष । अ॒ना॒यु॒धासो॒ असु॑रा अदे॒वाश्च॒क्रेण॒ ताँ अप॑ वप ऋजीषिन् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tigmam āyudham marutām anīkaṁ kas ta indra prati vajraṁ dadharṣa | anāyudhāso asurā adevāś cakreṇa tām̐ apa vapa ṛjīṣin ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ति॒ग्मम् । आयु॑धम् । म॒रुता॑म् । अनी॑कम् । कः । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । प्रति॑ । वज्र॑म् । द॒ध॒र्ष॒ । अ॒ना॒यु॒धासः॑ । असु॑राः । अ॒दे॒वाः । च॒क्रेण॑ । तान् । अप॑ । व॒प॒ । ऋ॒जी॒षि॒न् ॥ ८.९६.९

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:96» मन्त्र:9 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:33» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:9


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्राणसाधना- क्रियाशीलता-प्रभु उपासना

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो! यह (मरुतां अनीकम्) = प्राणों का सैन्य (तिग्मायुधम्) = बड़े तीव्र अस्त्रवाला है। प्राणसाधना के होने पर शत्रु इस साधक का घर्षण नहीं कर सकते। हे प्रभो ! (क:) = कौन (वे) = आपके (वज्रं प्रति दधर्ष) = क्रियाशीलता रूप वज्र का धर्षण कर सकता है? मनुष्य प्राणसाधना करे और क्रियाशील बना रहे तो कोई भी काम-क्रोध आदि शत्रु इसे सता नहीं पाते। [२] (अदेवा:) = दिव्य भावनाओं से रहित ये (असुराः) = आसुरभाव (अनायुधासः) - प्राणसाधना व क्रियाशीलता के सामने आयुधशून्य हो जाते हैं। हे (ऋजीषिन्) = ऋजुता की [सरलता की ] प्रेरणा देनेवाले प्रभो! आप (चक्रेण) = इस दैनिक कार्यचक्र के द्वारा, दिनचर्या में लगे रहने के द्वारा (अप वप) = छिन्न कर डालिये। प्रभु की उपासना के साथ हम दैनिक कर्त्तव्यों में तत्पर रहें तो काम-क्रोध- लोभ आदि शत्रु सुदूर विनष्ट हो जायेंगे।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणसाधना, क्रियाशीलता व प्रभु उपासना ही वे शस्त्र हैं जिनसे काम-क्रोध आदि शत्रुओं का संहार हो जाता है।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, O soul, the powers of the Maruts, pranas, is really your fiery thunderbolt. Who holds a weapon counter to thunder? The evil forces are, in fact, without any force and weapon. Nor do they have anything positive and divine about them. Rise, move and shoot your wheel of concentrated force and strike them down.