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वृ॒त्रस्य॑ त्वा श्व॒सथा॒दीष॑माणा॒ विश्वे॑ दे॒वा अ॑जहु॒र्ये सखा॑यः । म॒रुद्भि॑रिन्द्र स॒ख्यं ते॑ अ॒स्त्वथे॒मा विश्वा॒: पृत॑ना जयासि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vṛtrasya tvā śvasathād īṣamāṇā viśve devā ajahur ye sakhāyaḥ | marudbhir indra sakhyaṁ te astv athemā viśvāḥ pṛtanā jayāsi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वृ॒त्रस्य॑ । त्वा॒ । श्व॒सथा॑त् । ईष॑माणाः । विश्वे॑ । दे॒वाः । अ॒ज॒हुः॒ । ये । सखा॑यः । म॒रुत्ऽभिः॑ । इ॒न्द्र॒ । स॒ख्यम् । ते॒ । अ॒स्तु॒ । अथ॑ । इ॒माः । विश्वाः॑ । पृत॑नाः । ज॒या॒सि॒ ॥ ८.९६.७

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:96» मन्त्र:7 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:33» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:7


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्राणसाधना-वृत्रविनाश-देव मित्रता

पदार्थान्वयभाषाः - [१] शरीर में जब ज्ञान की आवरणभूत वासना का प्रवेश होता है तो (वृत्रस्य) = इस कामदेव के (श्वसथात्) = श्वास से (ईषमाणाः) = सब ओर भागते हुए (विश्वे देवा:) = सब दिव्य भाव, ये (सखायः) = जो अब तक तेरे मित्र थे वे (त्वा अजहुः) = तुझे छोड़ जाते हैं। वासना के साथ दिव्य गुणों का वास नहीं। [२] हे इन्द्रजितेन्द्रिय पुरुष (मरुद्भिः) = प्राणों के साथ (ते) = तेरा (सख्यम्) = मित्रभाव अस्तु हो । तू प्राणसाधना करनेवाला बन। (अथ) = अब (इमाः विश्वाः पृतना:) = इन शरीर - राष्ट्र में घुस आनेवाली वासनात्मक शत्रु सेनाओं को जयासि तू जीत लेता है। प्राणसाधना वासनाविलय का हेतु बनती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- वासना ही दिव्य गुणों की शत्रु है। हम प्राणसाधना द्वारा वासना का विनाश करें और दिव्य गुणों की मित्रता को प्राप्त करें।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O soul of man, when at the frightful breath of evil forces of thought and the external world all your noble faculties who are your friends forsake you out of fear and insecurity, at that time, Indra, O soul, of innate power and self-confidence, hold on, be friends with the Maruts, vital pranic powers, and surely you would win in all the battles against evil.