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तमु॑ ष्टवाम॒ य इ॒मा ज॒जान॒ विश्वा॑ जा॒तान्यव॑राण्यस्मात् । इन्द्रे॑ण मि॒त्रं दि॑धिषेम गी॒र्भिरुपो॒ नमो॑भिर्वृष॒भं वि॑शेम ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tam u ṣṭavāma ya imā jajāna viśvā jātāny avarāṇy asmāt | indreṇa mitraṁ didhiṣema gīrbhir upo namobhir vṛṣabhaṁ viśema ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तम् । ऊँ॒ इति॑ । स्त॒वा॒म॒ । यः । इ॒मा । ज॒जान॑ । विश्वा॑ । जा॒तानि॑ । अव॑राणि । अ॒स्मा॒त् । इन्द्रे॑ण । मि॒त्रम् । दि॒धि॒षे॒म॒ । गीः॒ऽभिः । उपो॒ इति॑ । नमः॑ऽभिः । वृ॒ष॒भम् । वि॒शे॒म॒ ॥ ८.९६.६

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:96» मन्त्र:6 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:33» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:6


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

गीर्भिः- नमोभिः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (तं स्तवाम) = उस प्रभु का ही स्तवन करते हैं, (यः) = जो (इमा जजान) = इन सब लोकों को प्रादुर्भूत करते हैं। (विश्वा) = सब (जातानि) = प्रादुर्भूत हुए हुए लोक-लोकान्तर (अस्मात् अवराणि) = इस प्रभु से अवरकाल में होनेवाले हैं। 'हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे'। [२] इन्द्रेण उस प्रभु के साथ ही (गीर्भिः) = इन ज्ञान की वाणियों के द्वारा (मित्रं दिधिषेम) = मैत्री को धारण करें। (उ) = और (नमोभिः) = नमस्कारों के द्वारा (वृषभम्) = उस शक्तिशाली प्रभु को (उपविशेम) = समीपता से प्राप्त हों, प्रभु के समीप उपविष्ट हों।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- ज्ञान की वाणियों द्वारा उस प्रभु की मित्रता को प्राप्त करें, नमस्कार द्वारा प्रभु के समीप उपविष्ट हों।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - We worship him that brought all these forms of existence into being after him. Let us win friendship with Indra, and with hymns of adoration presented with homage and humility, abide in his presence at the closest.