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आ यद्वज्रं॑ बा॒ह्वोरि॑न्द्र॒ धत्से॑ मद॒च्युत॒मह॑ये॒ हन्त॒वा उ॑ । प्र पर्व॑ता॒ अन॑वन्त॒ प्र गाव॒: प्र ब्र॒ह्माणो॑ अभि॒नक्ष॑न्त॒ इन्द्र॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā yad vajram bāhvor indra dhatse madacyutam ahaye hantavā u | pra parvatā anavanta pra gāvaḥ pra brahmāṇo abhinakṣanta indram ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । यत् । वज्र॑म् । बा॒ह्वोः । इ॒न्द्र॒ । धत्से॑ । म॒द॒ऽच्युत॑म् । अह॑ये । हन्त॒वै । ऊँ॒ इति॑ । प्र । पर्व॑ताः । अन॑वन्त । प्र । गावः॑ । प्र । ब्र॒ह्माणः॑ । अ॒भि॒ऽनक्ष॑न्तः । इन्द्र॑म् ॥ ८.९६.५

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:96» मन्त्र:5 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:32» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:5


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'मदच्युत वज्र'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = प्रभु-विद्रावक जितेन्द्रिय पुरुष ! (यद्) = जब तू (बाह्वोः) = अपनी भुजाओं में (मदच्युतम्) = शत्रुओं के मद को च्युत करनेवाले (वज्रम्) = वज्र को (आधत्से) = धारण करता है, तो (उ) = निश्चय से (अहवे हन्तवै) = यह वज्र वासनारूप अहि के विनाश के लिये होता है। उस समय (पर्वताः) = अविद्या पर्वत (प्र अनवन्त) = [नवते - To go] प्रकर्षेण हिल जाते हैं। क्रियाशीलता ही वज्र है । यही अविद्या पर्वत का विनाश करती है। [२] इस अविद्या पर्वत के भेदन के होने पर (इन्द्रम्) = इस जितेन्द्रिय पुरुष को (गावः) = सब इन्द्रियाँ (प्र अभिनक्षन्त) = खूब ही अभिमुख्येन प्राप्त होती हैं। और (ब्रह्माणः) = इस इन्द्र को ज्ञानी पुरुष प्राप्त होते हैं। इन ज्ञानियों के सम्पर्क में इसका ज्ञान खूब ही बढ़ता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- क्रियाशीलता से वासना विनष्ट होती है। इस से अज्ञान के पर्वत का विदारण होता तब इन्द्रियाँ स्वस्थ होती हैं। और ज्ञान की वृद्धि होती हैं।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, when you hold the pride shattering thunderbolt in hands for the destruction of evil forces, mountains bend, earths adore, and divines sing hymns of praise to celebrate your glory.