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मन्ये॑ त्वा य॒ज्ञियं॑ य॒ज्ञिया॑नां॒ मन्ये॑ त्वा॒ च्यव॑न॒मच्यु॑तानाम् । मन्ये॑ त्वा॒ सत्व॑नामिन्द्र के॒तुं मन्ये॑ त्वा वृष॒भं च॑र्षणी॒नाम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

manye tvā yajñiyaṁ yajñiyānām manye tvā cyavanam acyutānām | manye tvā satvanām indra ketum manye tvā vṛṣabhaṁ carṣaṇīnām ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

मन्ये॑ । त्वा॒ । य॒ज्ञिय॑म् । य॒ज्ञिया॑नाम् । मन्ये॑ । त्वा॒ । च्यव॑नम् । अच्यु॑तानाम् । मन्ये॑ । त्वा॒ । सत्व॑नाम् । इ॒न्द्र॒ । के॒तुम् । मन्ये॑ । त्वा॒ । वृ॒ष॒भम् । च॒र्ष॒णी॒नाम् ॥ ८.९६.४

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:96» मन्त्र:4 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:32» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:4


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'यज्ञिय, च्यवन, केतु, वृषभ'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे मैं प्रभो ! (त्वा) = आपको (यज्ञियानां यज्ञियम्) = पूजनीयों में पूजनीय (मन्ये) = मानता हूँ। 'माता, पिता, आचार्य व अतिथि' पूज्य हैं। उन सब के भी पूज्य प्रभु हैं। प्रभु पूजनीयों के भी पूजनीय हैं। हे प्रभो ! मैं (त्वा) = आपको (अच्युतानाम्) = अतिप्रबल शत्रुओं के भी (च्यवनम्) = च्युत करनेवाला, नष्ट करनेवाला (मन्ये) = जानता हूँ। [२] (त्वा) = आपको मैं हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (सत्वनाम्) = स्तुतियों व हवियों द्वारा सम्भजन करनेवालों का (केतुं मन्ये) = रोगापनयन द्वारा उत्तम निवास को करनेवाला जानता हूँ । (त्वा) = आपको (चर्षणीनाम्) = श्रमशील मनुष्यों का (वृषभम्) = सुखों का वर्षण करनेवाला (मन्ये) = मानता हूँ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु पूज्य हैं, शत्रु संहारक हैं। भक्तों के जीवन को उत्तम बनानेवाले हैं, श्रमशील व्यक्तियों को सुखी करनेवाले हैं।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, hero of invincible power, plan and action, I honour as the most revered of the powers worthy of love and homage in yajna. Of the unmoved and immovables, I honour you as the greatest mover and the moving at the highest velocity. Of the real, the true, the eternal, I honour you as the first and highest. And of the dynamic visionaries, I honour you as the highest visionary, most dynamic in power and generosity.