अविद्या पर्वत के २१ शिखरों का वेधन
पदार्थान्वयभाषाः - [१] इस इन्द्र के द्वारा (गिरीणाम्) = अविद्या पर्वतों के (संहिता) = अतिदृढ़ (त्रिः सप्त) = इक्कीस (सानु) = शिखर (विथुरेण चित्) = निश्चय से शत्रुओं के लिये (व्यथा) = कर (अस्ता) = क्रियाशीलतारूप अस्त्र के द्वारा (अतिविद्धा) = अतिशयेन विद्ध किये जाते हैं। स्थान व समय के दृष्टिकोण से अविद्या इक्कीस भागों में विभक्त है। १२ मास व ६ ऋतुएँ समय को सूचित करती हैं तथा तीन लोक [पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक] स्थान को । इन के विषय में अज्ञान ही गिरि हैं। इनके शिखरों का भेदन क्रियाशीलतारूप वज्र के द्वारा ही होता है। [२] इन अविद्यापर्वत भेदन आदि (यानि) = जिन कर्मों को (प्रवृद्धः) = जितेन्द्रियता द्वारा प्रवृद्ध शक्तिवाला (वृषयः) = चकार यह प्रजाओं पर सुखों का वर्षण करनेवाला इन्द्र करता है, (तत्) = उस कर्म को (न देवः) = न कोई देव व (न मर्त्यः) = न ही मनुष्य (तुतुर्यात्) = हिंसित कर पाता है। इन्द्र के इन प्रजा हितकारी कर्मों में आधिदैविक व आधिभौतिक आपत्तियाँ नहीं आतीं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - एक जितेन्द्रिय पुरुष क्रियाशीलतारूप वज्र के द्वारा अविद्या का विनाश करता है। तथा प्रवृद्ध शक्तिवाला बनकर ज्ञान प्रसार द्वारा लोगों पर सुखों का वर्षण करता है। इसके इस कर्म में आधिदैविक व आधिभौतिक विघ्न नहीं आते।