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त्वं ह॒ त्यत्स॒प्तभ्यो॒ जाय॑मानोऽश॒त्रुभ्यो॑ अभव॒: शत्रु॑रिन्द्र । गू॒ळ्हे द्यावा॑पृथि॒वी अन्व॑विन्दो विभु॒मद्भ्यो॒ भुव॑नेभ्यो॒ रणं॑ धाः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvaṁ ha tyat saptabhyo jāyamāno śatrubhyo abhavaḥ śatrur indra | gūḻhe dyāvāpṛthivī anv avindo vibhumadbhyo bhuvanebhyo raṇaṁ dhāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वम् । ह॒ । त्यत् । स॒प्तऽभ्यः॑ । जाय॑मानः । अ॒श॒त्रुऽभ्यः॑ । अ॒भ॒वः॒ । शत्रुः॑ । इ॒न्द्र॒ । गू॒ळ्हे । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । अनु॑ । अ॒वि॒न्दः॒ । वि॒भ्म॒त्ऽभ्यः॑ । भुव॑नेभ्यः । रण॑म् । धाः॒ ॥ ८.९६.१६

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:96» मन्त्र:16 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:35» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:16


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

काम आदि सात शत्रुओं का शातन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष (त्वम्) = तू (ह) = निश्चय से (त्यत्) = उस कर्म को करता है कि (जायमानः) = विकास को प्राप्त होता हुआ तू (अशत्रुभ्यः) = जिनका शातन [समाप्ति] बड़ा कठिन है उन (सप्तभ्यः) = 'काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर व अविद्या' नामक सात शत्रुओं के लिये (शत्रुः अभवः) = शातन करनेवाला होता है। [२] इन शत्रुओं का शातन करके (गूढे द्यावापृथिवी) = शत्रुओं से आवृत हुए हुए मस्तिष्क व शरीर को तू फिर से (अन्वविन्दः) = प्राप्त करता है। काम- लोभ आदि ने इनको आवृत-सा कर लिया था। काम आदि के विनाश से हम इन्हें फिर प्राप्त करनेवाले होते हैं। इनको काम आदि के आवरण से रहित करके (विभुमद्भ्यः) = महत्त्वयुक्त (भुवनेभ्यः) = लोकों के लिये, शरीर के सब अंगों के लिये, (रणं धाः) = रमणीयता को तू धारण करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- 'काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर व अविद्या' ये हमारे प्रबल शत्रु हैं। इनका शातन करके ही हम मस्तिष्क व शरीर को स्वस्थ कर पाते हैं और सब अंगों के लिये रमणीयता को धारण करनेवाले होते हैं।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Thus does Indra become a victorious enemy for the seven unrivalled unholy tendencies of sense and mind and emerges a brilliant unrivalled hero. Thus does he find the real joyous heaven and earth otherwise, for him, covered in deep darkness. Thus do you, O soul, bear and bring happiness to the regions of life vested in dignity and excellence.