वांछित मन्त्र चुनें

अध॑ द्र॒प्सो अं॑शु॒मत्या॑ उ॒पस्थेऽधा॑रयत्त॒न्वं॑ तित्विषा॒णः । विशो॒ अदे॑वीर॒भ्या॒३॒॑चर॑न्ती॒र्बृह॒स्पति॑ना यु॒जेन्द्र॑: ससाहे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

adha drapso aṁśumatyā upasthe dhārayat tanvaṁ titviṣāṇaḥ | viśo adevīr abhy ācarantīr bṛhaspatinā yujendraḥ sasāhe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अध॑ । द्र॒प्सः । अं॒शु॒ऽमत्याः॑ । उ॒पऽस्थे॑ । अधा॑रयत् । त॒न्व॑म् । ति॒त्वि॒षा॒णः । विशः॑ । अदे॑वीः । अ॒भि । आ॒ऽचर॑न्तीः । बृह॒स्पति॑ना । यु॒जा । इन्द्रः॑ । स॒स॒हे॒ ॥ ८.९६.१५

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:96» मन्त्र:15 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:34» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:15


0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

स्वाध्याय व प्रभु मैत्री

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अध) = अब (द्रप्सः) = परमात्मा का छोटा रूप यह जीव (अंशमत्याः) = प्रकाश की किरणोंवाली ज्ञान नदी के (उपस्थे) = समीप (अधारयत्) = अपने को धारण करता है। इस प्रकार यह अपने (तन्वम्) = शरीर को (तित्विषाणः) = दीप्त करनेवाला होता है। 'शरीर में तेज, मस्तिष्क में ज्ञान' इस प्रकार यह चमक उठता है। [२] यह तित्विषाण (इन्द्रः) = जितेन्द्रिय पुरुष (अदेवी:) = आसुरी (अभ्याचरन्तीः) = आक्रमण करती हुई (विशः) = प्रजाओं को काम-क्रोध आदि आसुरभावों को (बृहस्पतिना युजा) = ज्ञान के स्वामी प्रभु को साथी के रूप में पाकर ससाहे अभिभूत करनेवाला होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-स्वाध्याय व प्रभु की मित्रता हमें वासनाओं के आक्रमण से बचाती हैं। प्रभु की मित्रता से हम सब शत्रुओं का पराभव कर पाते हैं।
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - When the dark passion is cleansed out, then pure vitality, lustrous and sparkling, sustains itself in the lap of creative life aflow. Indra, exuberant soul purified and tempered, in cooperation with wide ranging pranic energies, challenge and fight out the unholy tendencies of carnal mind ranging around.