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द्र॒प्सम॑पश्यं॒ विषु॑णे॒ चर॑न्तमुपह्व॒रे न॒द्यो॑ अंशु॒मत्या॑: । नभो॒ न कृ॒ष्णम॑वतस्थि॒वांस॒मिष्या॑मि वो वृषणो॒ युध्य॑ता॒जौ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

drapsam apaśyaṁ viṣuṇe carantam upahvare nadyo aṁśumatyāḥ | nabho na kṛṣṇam avatasthivāṁsam iṣyāmi vo vṛṣaṇo yudhyatājau ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

द्र॒प्सम् । अ॒प॒श्य॒म् । विषु॑णे । चर॑न्तम् । उ॒प॒ऽह्व॒रे । न॒द्यः॑ । अं॒शु॒ऽमत्याः॑ । नभः॑ । न । कृ॒ष्णम् । अ॒व॒त॒स्थि॒ऽवांस॑म् । इष्या॑मि । वः॒ । वृ॒ष॒णः॒ । युध्य॑त । आ॒जौ ॥ ८.९६.१४

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:96» मन्त्र:14 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:34» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:14


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

नभः न

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (द्रप्सम्) = उस प्रभु के छोटे रूप जीव को (विषुणे) = उस चारों ओर गति [ व्याप्ति] वाले प्रभु में (पश्यम्) = मैं देखता हूँ। प्रभु की गोद में जीव को स्थित अनुभव करता हूँ। यह (अंशुमत्याः नद्यः) = प्रकाश की किरणोंवाली ज्ञान नदी [सरस्वती] के (उपह्वरे) = अत्यन्त गूढ़ स्थान में (चरन्तम्) = गति कर रहा है। [२] (नभः न) = आदित्य के समान (अवतस्थिवांसम्) = स्थित (कृष्णाम्) = वासनाओं के क्षीण करनेवाले को (इष्यामि) = चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि मैं वासनारूप वृत्र को विनष्ट करके सूर्य की तरह चमकूँ। हे (वृषणः) = शक्तिशाली मरुतो [ प्राणो ] ! (वः) = तुम (आजौ) = संग्राम में (युध्यत) = इन वासनारूप शत्रुओं के साथ युद्ध करो। इन्हें पराजित करके ही तो मैं चमक सकूँगा।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- जीव उस व्यापक प्रभु में स्थित अपने को देखे । सदा ज्ञान के अन्दर विचरने का प्रयत्न करे। प्राणसाधना द्वारा वासनाओं का विनाश करके सूर्य की तरह चमके ।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - I have seen the dark devil of passion and pride roaming around widely and variously on the banks of the vibrant stream of life. O mighty energies of prana and divine potential, I wish you fight in the battle and, like unfailing agents of cleansing of dirt, throw out the dark evil standing out and working boldly as well as surreptitiously.