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अव॑ द्र॒प्सो अं॑शु॒मती॑मतिष्ठदिया॒नः कृ॒ष्णो द॒शभि॑: स॒हस्रै॑: । आव॒त्तमिन्द्र॒: शच्या॒ धम॑न्त॒मप॒ स्नेहि॑तीर्नृ॒मणा॑ अधत्त ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ava drapso aṁśumatīm atiṣṭhad iyānaḥ kṛṣṇo daśabhiḥ sahasraiḥ | āvat tam indraḥ śacyā dhamantam apa snehitīr nṛmaṇā adhatta ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अव॑ । द्र॒प्सः । अं॒शु॒ऽमती॑म् । अ॒ति॒ष्ठ॒त् । इ॒या॒नः । कृ॒ष्णः । द॒शऽभिः॑ । स॒हस्रैः॑ । आव॑त् । तम् । इन्द्रः॑ । शच्या॑ । धम॑न्तम् । अप॑ । स्नेहि॑तीः । नृ॒ऽमनाः॑ । अ॒ध॒त्त॒ ॥ ८.९६.१३

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:96» मन्त्र:13 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:34» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:13


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अंशुमतीं अवातिष्ठत् [द्रप्सः, कृष्णः]

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (द्रप्स:) = [drop, a spark] प्रभु का अंश रूप [miniature ] यह जीव (दशभिः) = दस (सहस्त्रैः) = [सहस्= बल] बलवान् प्राणों के साथ (इयानः) = गति करता हुआ (कृषअम:) = सब दोषों को कृश करनेवाला होता है और (अंशुमतीम्) = प्रकाश की किरणोंवाली ज्ञान नदी के समीप (अवतिष्ठत्) = नम्रता से स्थित होता है। [२] (शच्या) = शक्ति व प्रज्ञान से (धमन्तम्) = [ To cast, throw away] शत्रुओं को परे फेंकते हुए (तम्) = उस कृष्णा को (इन्द्रः) = वे परमैश्वर्यशाली प्रभु (आवत्) = रक्षित करते हैं। (नृमणाः) = [नृषु मनो यस्य] कर्मनेता मनुष्यों में प्रेमवाले वे प्रभु (स्नेहिती:) = सबका हिंसन करनेवाली वासनाओं को (अप अधत्त) = सुदूर स्थापित करनेवाले होते हैं, वासनाओं के प्रभु विनाशक हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-जीव जब अंशुमती [ज्ञान की किरणोंवाली] सरस्वती का उपासक बनता है, तो प्रभु उसका रक्षण करते हैं और उसकी वासनाओं को विनष्ट करते हैं।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The dark passion of pride with its ten thousand assistants and associates comes, occupies the affections and suppresses the emotive and creative streams of life, but Indra, noble leader of men, the soul, with its great thought and action, takes this bully over, controls its violence and covers it with sweetness and love.