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उ॒क्थवा॑हसे वि॒भ्वे॑ मनी॒षां द्रुणा॒ न पा॒रमी॑रया न॒दीना॑म् । नि स्पृ॑श धि॒या त॒न्वि॑ श्रु॒तस्य॒ जुष्ट॑तरस्य कु॒विद॒ङ्ग वेद॑त् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ukthavāhase vibhve manīṣāṁ druṇā na pāram īrayā nadīnām | ni spṛśa dhiyā tanvi śrutasya juṣṭatarasya kuvid aṅga vedat ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उ॒क्थऽवा॑हसे । वि॒ऽभ्वे॑ । म॒नी॒षाम् । द्रुणा॑ । न । पा॒रम् । ई॒र॒य॒ । न॒दीना॑म् । नि । स्पृ॒श॒ । धि॒या । त॒न्वि॑ । श्रु॒तस्य॑ । जुष्ट॑ऽतरस्य । कु॒वित् । अ॒ङ्ग । वेद॑त् ॥ ८.९६.११

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:96» मन्त्र:11 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:34» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:11


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

द्रुणा न पारमीरया नदीनाम्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (उक्थवाहसे) = स्तोत्रों के द्वारा धारण किये जानेवाले (विभ्वे) = उस महान् व शत्रुओं का अभिभव करनेवाले प्रभु के लिये (मनीषाम्) = बुद्धि को (ईरय) = प्रेरित कर । तद्बुद्धि बन । प्रभु की महिमा का ही चिन्तन करनेवाला हो। उस प्रभु का चिन्तन कर जो तुझे (नदीनां पारं द्रुणा न) = नदियों के पार नाव के द्वारा ले जाने के समान ही भवसागर से पार ले जाते हैं। [२] प्रभु की उपासना के द्वारा (तन्वि) = अपने में धिया बुद्धि के द्वारा (जुष्टतरस्य) = अतिशयेन सेवनीय (श्रुतस्य) = शास्त्रज्ञान का (निस्पृश) = स्पर्श कर खूब ही स्वाध्याय के द्वारा ज्ञान का वर्धन करनेवाला बन। वे प्रभु (अंग) = शीघ्र ही (कुवित्) = खूब (वेदत्) = धन को प्राप्त कराते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम स्तवन व स्वाध्याय में प्रवृत्त हों। प्रभु हमें भवसागर से पार ले जानेवाले होंगे।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O man, direct and send up your thoughts and prayers over to the great omnipotent Indra who loves the devotee’s songs of adoration. Send up the adorations as we cross over the rivers by boat. And with your vision, intelligence and action feel the touch of the dear divine lord of universal presence and glory in the very core of your heart. Would not the lord dear as breath of life not oblige and bless?