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अ॒स्मा उ॒षास॒ आति॑रन्त॒ याम॒मिन्द्रा॑य॒ नक्त॒मूर्म्या॑: सु॒वाच॑: । अ॒स्मा आपो॑ मा॒तर॑: स॒प्त त॑स्थु॒र्नृभ्य॒स्तरा॑य॒ सिन्ध॑वः सुपा॒राः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

asmā uṣāsa ātiranta yāmam indrāya naktam ūrmyāḥ suvācaḥ | asmā āpo mātaraḥ sapta tasthur nṛbhyas tarāya sindhavaḥ supārāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒स्मै । उ॒षसः॑ । आ । अ॒ति॒र॒न्त॒ । याम॑म् । इन्द्रा॑य । नक्त॑म् । ऊर्म्याः॑ । सु॒ऽवाचः॑ । अ॒स्मै । आपः॑ । मा॒तरः॑ । स॒प्त । त॒स्थुः॒ । नृऽभ्यः॑ । तरा॑य । सिन्ध॑वः । सु॒ऽपा॒राः ॥ ८.९६.१

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:96» मन्त्र:1 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:32» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:1


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'इन्द्र' का जीवन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अस्मै इन्द्राय) = इस 'जितेन्द्रिय पुरुष' के लिये (उषासः) = उषायें (यामं आतिरन्त) = नियमन की भावना को बढ़ाती हैं। यह उषा में प्रबुद्ध होकर प्रभु स्मरण में मन को एकाग्र करने का प्रयत्न करता है। । तथा (ऊर्म्या:) = [ऊर्म्या = Light] रातें (नक्तम्) = अपर रात्रिकाल में (सुवाचः) = शोभन वाणियों-वाली होती हैं। उस समय प्रबुद्ध होकर ये जितेन्द्रिय पुरुष वेदाध्ययन व शास्त्र श्रवण चिन्तनादि कर्मों में प्रवृत्त होते हैं। [२] (अस्मा) = इसके लिये (आप:) = शरीरस्थ रेतःकण (मातर:) = जीवन का निर्माण करनेवाले व (सप्त) = सर्पणशील होकर अंग-प्रत्यंग में रुधिर के साथ गतिवाले होकर (तस्थुः) = स्थित होते हैं। और (सिन्धवः) = ज्ञान की नदियाँ (सुपाराः) = शोभनतया पार ले जानेवाली व (नृभ्यः तराय) = लोगों के लिये तैरने के लिये होती हैं, लोगों को विषयों से पार ले जाती हैं। यह लोगों में ज्ञान का प्रसार करता हुआ उन्हें विषय-वासनाओं से दूर ले है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - इन्द्र, एक जितेन्द्रिय पुरुष - [क] प्रातः जागकर मन को एकाग्र करने का अभ्यास करता है, [ख] अपररात्रिकाल में वेदवाणियों द्वारा स्तोत्रों का उच्चारण करता है, [ग] रेतःकणों को शरीर में सुरक्षित करता है, [घ] लोगों में ज्ञान का प्रसार करता है।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - For Indra, this lord supreme ruler and ordainer of the universe, the dawns advance their course, for Indra, the last hours of the night are sanctified with voices of adoration, for this same lord, seven motherly dynamics of nature, i.e., five elements, mind and pranic energies, keep to their tasks in nature’s law, and for him the rivers and seas ebb and flow for human navigation.