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तमु॑ ष्टवाम॒ यं गिर॒ इन्द्र॑मु॒क्थानि॑ वावृ॒धुः । पु॒रूण्य॑स्य॒ पौंस्या॒ सिषा॑सन्तो वनामहे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tam u ṣṭavāma yaṁ gira indram ukthāni vāvṛdhuḥ | purūṇy asya pauṁsyā siṣāsanto vanāmahe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तम् । ऊँ॒ इति॑ । स्त॒वा॒म॒ । यम् । गिरः॑ । इन्द्र॑म् । उ॒क्थानि॑ । व॒वृ॒धुः । पु॒रूणि॑ । अ॒स्य॒ । पौंस्या॑ । सिसा॑सन्तः । व॒ना॒म॒हे॒ ॥ ८.९५.६

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:95» मन्त्र:6 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:31» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:6


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु-भजन व प्रभु पौंस्य प्राप्ति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (तम्) = उस (इन्द्रम्) = परमेश्वर्यशाली प्रभु का (उ) = ही हम (स्तवाम) = स्तवन करते हैं। (यम्) = जिस प्रभु को (गिर:) = सब ज्ञान की वाणियाँ तथा (उक्थानि) = स्तुति - वचन (वावृधुः) = बढ़ाते हैं। जितना- जितना हम इन ज्ञान की वाणियों व स्तुतिवचनों को उच्चरित करते हैं, उतना उतना ही प्रभु को अपने में बढ़ा पाते हैं। प्रभु की दिव्यता का धारण ही प्रभु का वर्धन है। [२] (अस्य) = इस प्रभु का (पौंस्या) = बल (पुरूणि) = बहुत अधिक व पालक व पूरक हैं। इन बलों को (सिषासन्तः) = प्राप्त करने की कामनावाले होते हुए हम (वनामहे) = प्रभु का सम्भजन करते हैं। प्रभु सम्भजन हमें प्रभु के इन बलों में भागी बनाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- ज्ञान की वाणियों व स्तुति वचनों से हम प्रभु का सम्भजन करते हैं। यह सम्भजन हमें प्रभु के बलों में भागी बनाता है।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - We adore and worship Indra whom hymns and songs of adoration exalt, and we pray to him for the gift of many forms of strength, honour and excellence.