पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो ! (गिरः) = ये ज्ञानपूर्वक उच्चरित स्तुतिवाणियाँ (त्वा आ अस्थुः) = आपको प्राप्त होती हैं। ये हमें आपकी ओर लानेवाली होती हैं। हे (गिर्वणः) = स्तुतिवाणियों से सम्भजनीय प्रभो ! (सुतेषु) = शरीर में सोम का सम्पादन होने पर आप हमारे लिये (रथीः इव) = रथवान् की तरह होते हैं, एक रथवान् की तरह आप ही हमें लक्ष्य -स्थान पर पहुँचाते हैं। [२] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो! ये उपासक (त्वा) = आपको (अभि) = दिन के दोनों ओर प्रातः व सायं (समनूषत) = स्तुत करते हैं, (न) = जैसे (मातर:) = धेनुएँ (वत्सम्) = बछड़े की प्रति प्रेम से हम्भाख को करती हैं। ये उपासक भी प्रेम से स्तुति - वचनों का उच्चारण करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु का स्तवन करें। प्रातः - सायं प्रेम से किया गया यह प्रभु-स्तवन हमें लक्ष्य-स्थान पर पहुँचानेवाला होगा।