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आ ये विश्वा॒ पार्थि॑वानि प॒प्रथ॑न्रोच॒ना दि॒वः । म॒रुत॒: सोम॑पीतये ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā ye viśvā pārthivāni paprathan rocanā divaḥ | marutaḥ somapītaye ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । ये । विश्वा॑ । पार्थि॑वानि । प॒प्रथ॑न् । रो॒च॒ना । दि॒वः । म॒रुतः॑ । सोम॑ऽपीतये ॥ ८.९४.९

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:94» मन्त्र:9 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:29» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:9


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्राणसाधना-सोमरक्षण- दीप्ति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ये) = जो मरुत् (विश्वा) = सब (पार्थिवानि) = इस पार्थिव शरीर के अंगों की शक्ति को तथा (दिवः रोचना) = मस्तिष्करूप द्युलोक के दीप्त विज्ञानों को (आ पप्रथन्) = विस्तृत करते हैं। वे (मरुतः) = मरुत् ४९ भागों में बटे हुए प्राण (सोमपीतये) = सोम के पान के लिये हों। प्राणसाधना द्वारा हम सोम का रक्षण करनेवाले बनें। [२] प्राणसाधना द्वारा शरीर में सोम की ऊर्धगति होती है। सोम का शरीर में ही व्यापन होता है। शरीर में व्याप्त हुआ यह सोम अंगों को तेज से दीप्त करता है और मस्तिष्क को ज्ञानदीप्त बनाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमारे शरीर में प्राणसाधना द्वारा सोम का व्यापन हो। यह सोम अंगों को तेजस्वी व मस्तिष्क को दीप्त बनाये।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Those Maruts, pioneers of nature and humanity, who have extended the beauties of existence, both earthly and heavenly, for the experience and higher awareness of the joy and ecstasy of it,