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कद॑त्विषन्त सू॒रय॑स्ति॒र आप॑ इव॒ स्रिध॑: । अर्ष॑न्ति पू॒तद॑क्षसः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

kad atviṣanta sūrayas tira āpa iva sridhaḥ | arṣanti pūtadakṣasaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

कत् । अ॒त्वि॒ष॒न्त॒ । सू॒रयः॑ । ति॒रः । आपः॑ऽइव । स्रिधः॑ । अर्ष॑न्ति । पू॒तऽद॑क्षसः ॥ ८.९४.७

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:94» मन्त्र:7 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:29» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:7


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सूरयः -पूतदक्षसः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो ! (कत्) = [कदा] वह समय कब आयेगा जब कि मेरे जीवन में (अत्षिन्त) = ये मरुत् दीप्त होते हैं, चमक उठते हैं। ये मरुत् (सूरयः) = मुझे ज्ञानी बनानेवाले हैं। प्राणसाधना से ही उसी सोमरक्षण होकर ज्ञानदीप्ति प्राप्त होती है। ये मरुत् (स्त्रिधः) = शत्रुओं का संहार करनेवाले हैं, प्रकार (इव) = जैसे (तिर:) = रुधिर में तिरोहित हुए हुए (आप:) = रेत: कण रोगों का विनाश करते हैं। [२] (पूतदक्षसः) = शरीरस्थ बल को पवित्र करनेवाले ये मरुत् (अर्षन्ति) = शरीर में गति करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना से [क] ज्ञानदीप्ति प्राप्त होती है, [ख] रोगकृमि व वासनारूप शत्रुओं का विनाश होता है, [ग] बल पवित्र होता है।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - How brilliant and blazing are the brave, we scholars and warriors of pure and unsullied power and expertise who, like turbulent waters, break the violent down and move forward on the paths of rectitude!