पिब॑न्ति मि॒त्रो अ॑र्य॒मा तना॑ पू॒तस्य॒ वरु॑णः । त्रि॒ष॒ध॒स्थस्य॒ जाव॑तः ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
pibanti mitro aryamā tanā pūtasya varuṇaḥ | triṣadhasthasya jāvataḥ ||
पद पाठ
पिब॑न्ति । मि॒त्रः । अ॒र्य॒मा । तना॑ । पू॒तस्य॑ । वरु॑णः । त्रि॒ऽस॒ध॒स्थस्य॑ । जाव॑तः ॥ ८.९४.५
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:94» मन्त्र:5
| अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:28» मन्त्र:5
| मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:5
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
मित्र अर्यमा वरुण
पदार्थान्वयभाषाः - [५] (मित्रः) = सब पापों से अपने को बचानेवाला स्नेहशील [प्रमीते: चायते, मिद् स्नेहने], (अर्यमा) = [अरीन् यच्छति] काम-क्रोध-लोभ को वश में करनेवाला और (वरुणः) = द्वेष का निवारण करनेवाले पुरुष इस (पूतस्य) = वासना- विनाश के द्वारा पवित्र सोम का (तना) = शक्तियों के विस्तार के हेतु से (पिबन्ति) = पान करते हैं। सोमरक्षण के लिये 'मित्र, अर्यमा व वरुण' बनना चाहिये। सुरक्षित सोम शक्तियों के विस्तार का हेतु बनता है। [२] ये मित्र, वरुण व अर्यमा उस सोम का पान करते हैं जो (त्रिषधस्थस्य) = शरीर, मन व बुद्धि रूप तीनों स्थानों में समान रूप से स्थित होता है । शरीर को यह दृढ़ बनाता है, मन को प्रसन्न व मस्तिष्क को दीप्त बनाता है। इस प्रकार इस सोम की स्थिति इन तीनों स्थानों में है। यह सोम (जावतः) = विकासवाला है, सब शक्तियों के विकास का कारण बनता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम 'मित्र, वरुण व अर्यमा' बनकर सोम का रक्षण करते हैं। यह सोम हमारे शरीर, मन व मस्तिष्क तीनों को समानरूप से उन्नत करता है। यह हमारी शक्तियों के विकास का हेतु होता है।
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Mitra, men of universal love, Aryama, men of adventure on the paths of rectitude, and Varuna, men of judgement and right choice, continuously drink of this soma created and sanctified by the procreative power of divinity pervading in the three regions of the universe, heaven, earth and the sky.
