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तत्सु नो॒ विश्वे॑ अ॒र्य आ सदा॑ गृणन्ति का॒रव॑: । म॒रुत॒: सोम॑पीतये ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tat su no viśve arya ā sadā gṛṇanti kāravaḥ | marutaḥ somapītaye ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तत् । सु । नः॒ । विश्वे॑ । अ॒र्यः । आ । सदा॑ । गृ॒ण॒न्ति॒ । का॒रवः॑ । म॒रुतः॑ । सोम॑ऽपीतये ॥ ८.९४.३

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:94» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:28» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:3


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

तत् सु नो अर्यः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (विश्वे) = सब (काव:) = कार्यों को कुशलता से करनेवाले स्तोता लोग आ (गृणन्ति) = सदा यही सर्वत्र कहते हैं कि (तत्) = वह ब्रह्म ही (नः) = हमारा (सु अर्य:) = उत्तम स्वामी है। प्रभु को ही अधिष्ठाता मानकर उसके निर्देशों के अनुसार ये अपना जीवन बिताते हैं। [२] ये (मरुतः) = मितरावी व खूब क्रियाशील पुरुष (सोमपीतये) = शरीर में सोम का पान करने के लिये होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु को अपना स्वामी जानकर उसकी आराधना के लिये ही हम अपने कर्त्तव्यों को सम्यक् करें। परिमित बोलनेवाले खूब क्रियाशील बनकर सोम का शरीर में ही रक्षण करनेवाले हों।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - That same beauty and glory of existence and the mother’s magnanimity, all our poets and pioneers celebrate in song and heroic action. O Maruts, magnanimous men of might, come, act, and enjoy this soma of the Mother’s gift of glory.