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त्यं नु मारु॑तं ग॒णं गि॑रि॒ष्ठां वृष॑णं हुवे । अ॒स्य सोम॑स्य पी॒तये॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tyaṁ nu mārutaṁ gaṇaṁ giriṣṭhāṁ vṛṣaṇaṁ huve | asya somasya pītaye ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्यम् । नु । मारु॑तम् । ग॒णम् । गि॒रि॒ऽस्थाम् । वृष॑णम् । हु॒वे॒ । अ॒स्य । सोम॑स्य । पी॒तये॑ ॥ ८.९४.१२

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:94» मन्त्र:12 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:29» मन्त्र:6 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:12


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

गिरिष्ठां वृषणम्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (त्यम्) = उस (मारुतं गणम्) = प्राणों के गण को (नु) = निश्चय से (हुवे) = पुकारता हूँ, प्राणसाधना प्रवृत्त होता हूँ। इन प्राणों के गण का मैं आराधन करता हूँ जो (गिरिष्ठाम्) = ज्ञान की वाणियों में स्थित होनेवाला है तथा (वृषणम्) = हमें शक्तिशाली बनानेवाला है। [२] इस प्राणगण को मैं (अस्य सोमस्य) = इस सोम के (पीतये) = पान व रक्षण के लिये पुकारता हूँ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना सोमरक्षण द्वारा हमें ज्ञान की वाणियों में स्थित करती है और शक्तिशाली बनाती है। इस प्रकार सोमरक्षण द्वारा हम इस संसाररूपी 'अश्मन्वती नदी को पार करने में समर्थ होते हैं। सो 'तिरश्ची:' बनते हैं [crossing ouer, traversing]। आंगिरस - अंग-प्रत्यंग में रसवाले तो होते ही हैं। यह तिरश्ची आंगिरस ही अगले सूक्त का ऋषि है-
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - That host of Maruts generous as showers of clouds, abiding on high as on the peaks of mountains, I invoke and call to come and join us in the celebration of life’s beauty and glory for the experience and awareness of its divinity.