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देवता: इन्द्र: ऋषि: सुकक्षः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

गि॒रा वज्रो॒ न सम्भृ॑त॒: सब॑लो॒ अन॑पच्युतः । व॒व॒क्ष ऋ॒ष्वो अस्तृ॑तः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

girā vajro na sambhṛtaḥ sabalo anapacyutaḥ | vavakṣa ṛṣvo astṛtaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

गि॒रा । वज्रः॑ । न । सम्ऽभृ॑तः । सऽब॑लः । अन॑पऽच्युतः । व॒व॒क्षे । ऋ॒ष्वः । अस्तृ॑तः ॥ ८.९३.९

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:93» मन्त्र:9 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:22» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:9» मन्त्र:9


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

गिरा संभृतः वज्रो न

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (गिरा) = ज्ञानपूर्वक उच्चरित स्तुति-वाणियों के द्वारा (सम्भृतः) = सम्यक् धारण किया गया यह प्रभु (वज्रः न) = उपासक के लिये वज्र के समान होता है। उपासक इस प्रभुरूप वज्र के द्वारा ही काम-क्रोध आदि शत्रुओं का संहार करनेवाला होता है। वे प्रभु (सबलः) = सदा शक्ति के साथ वर्तमान हैं और (अपच्युतः) = कभी भी शत्रुओं द्वारा स्थानभ्रष्ट नहीं किये जाते। [२] ये (ऋष्वः) = महान् (अस्तृतः) = अहिंसित प्रभु (ववक्षे) = स्तोताओं के लिये धन आदि साधनों को प्राप्त कराने की कामनावाले होते हैं। इन साधनों को प्राप्त करके साधक उन्नतिपथ पर आगे बढ़ता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-स्तुति के द्वारा सम्भृत प्रभु स्तोता के हाथ में वज्र के समान होते हैं। वे सबल प्रभु शत्रुओं से च्युत नहीं किये जा सकते। ये महान् अहिंसित प्रभु ही स्तोता के लिये सब साधनों को प्राप्त कराते हैं।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Held in and by the voice of divinity like the roar of thunder and like the flood of sun-rays, it is powerful, unfallen, irrepressible and lofty with thought, so let it express itself freely.