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यद॒द्य कच्च॑ वृत्रहन्नु॒दगा॑ अ॒भि सू॑र्य । सर्वं॒ तदि॑न्द्र ते॒ वशे॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yad adya kac ca vṛtrahann udagā abhi sūrya | sarvaṁ tad indra te vaśe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत् । अ॒द्य । कत् । च॒ । वृ॒त्र॒ऽह॒न् । उ॒त्ऽअगाः॑ । अ॒भि । सू॒र्य॒ । सर्व॑म् । तत् । इ॒न्द्र॒ । ते॒ । वशे॑ ॥ ८.९३.४

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:93» मन्त्र:4 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:21» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:9» मन्त्र:4


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

इन्द्र, वृत्रहन्, सूर्य

पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रभु जीव से कहते हैं कि हे (वृत्रहन्) = वासनाओं को विनष्ट करनेवाले व (सूर्य) = सूर्य की तरह निरन्तर क्रियाशील जीव ! (यद्) = जब (अद्य कत् च) = आज या जब भी कभी तू (उत्) = प्रकृति से ऊपर उठकर (अभि अगा:) = मेरी ओर आता है तो (तत् सर्वम्) = वह सब, हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष ! (ते वशे) = तेरी इच्छा पर ही निर्भर करता है। तू दृढ़ संकल्प करेगा, वासनाओं को विनष्ट कर ज्ञानरस से दीप्त जीवनवाला बनेगा तो अवश्य मेरी ओर [प्रभु की ओर] आनेवाला होगा। [२] प्रभु की ओर आने पर हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष (तत् सर्वम्) = वह सब (ते वशे) = तेरे वश में होगा। प्रभु को प्राप्त कर लेने पर सब जगत् के पदार्थ तो प्राप्त हो ही जाते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु प्राप्ति का दृढ़ संकल्प करें। यह संकल्प हमें वासना विनाश में प्रवृत्त करेगा और तब हमारे जीवन में वासनाओं के मेघों का विलय होकर ज्ञानसूर्य का उदय होगा।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O sun, dispeller of darkness, whatever the aim and purpose for which you rise today, let that be, O Indra, lord ruler of the world, under your command and control.