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देवता: इन्द्र: ऋषि: सुकक्षः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

पत्नी॑वन्तः सु॒ता इ॒म उ॒शन्तो॑ यन्ति वी॒तये॑ । अ॒पां जग्मि॑र्निचुम्पु॒णः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

patnīvantaḥ sutā ima uśanto yanti vītaye | apāṁ jagmir nicumpuṇaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पत्नी॑ऽवन्तः । सु॒ताः । इ॒मे । उ॒शन्तः॑ । य॒न्ति॒ । वी॒तये॑ । अ॒पाम् । जग्मिः॑ । नि॒ऽचु॒म्पु॒णः ॥ ८.९३.२२

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:93» मन्त्र:22 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:25» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:9» मन्त्र:22


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अपां जग्मिः -निचुम्पुणः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (पत्नीवन्त:) = प्रशस्त पत्नियोंवाले, अर्थात् अपनी पत्नी के साथ सदा उत्तम कार्यों को करनेवाले (सुताः) = [सुतं अस्य अस्ति इति] सोम का सम्पादन करनेवाले इमे ये साधक (उशन्तः) = प्रभु प्राप्ति की कामनावाले होते हुए (वीतये यन्ति) = [To shine] प्रकाश के लिये गतिवाले होते हैं। इनका जीवन अधिकाधिक प्रकाशमय होता जाता है। [२] यह उपासक (अपां जग्मिः) = सदा कर्मों के प्रति जानेवाला, अर्थात् क्रियाशील होता है और (निचुम्पुणः) = [ नितरां चमनेन प्रीणति ] सोम के भक्षण अन्दर ही व्यापन के द्वारा अपना प्रीणन करनेवाला होता है। सोमरक्षण द्वारा अपने में प्रीति का अनुभव करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- गृहस्थ में प्रशस्त पत्नीवाले होते हुए हम सोमरक्षण द्वारा प्रभु प्राप्ति की कामनावाले बनें। सदा क्रियाशील होते हुए सोमरक्षण द्वारा जीवन में प्रीति का अनुभव करें।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - These sparkling life-giving streams of soma joys of life created by Indra in the world flow to the thirsty yajakas for their enlightenment and joy just as streams of water flow to the unsatiating sea.