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यस्य॑ ते॒ नू चि॑दा॒दिशं॒ न मि॒नन्ति॑ स्व॒राज्य॑म् । न दे॒वो नाध्रि॑गु॒र्जन॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yasya te nū cid ādiśaṁ na minanti svarājyam | na devo nādhrigur janaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यस्य॑ । ते॒ । नु । चि॒त् । आ॒ऽदिश॑म् । न । मि॒नन्ति॑ । स्व॒ऽराज्य॑म् । न । दे॒वः । न । अध्रि॑ऽगुः । जनः॑ ॥ ८.९३.११

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:93» मन्त्र:11 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:23» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:9» मन्त्र:11


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु के आदेश का पालन व स्वराज्य

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो ! (यस्य ते) = जिन आपके (आदिशम्) = आदेश को, आज्ञा को (नु चित्) = निश्चय से (न मिनन्ति) = कोई भी हिंसित नहीं कर पाते। वस्तुतः आपकी आज्ञा को हिंसित न करते हुए वे (स्वराज्यम्) = आत्मशासन को नष्ट नहीं करते। [२] (न देवः) = न तो देव (न) = नहीं (आध्रिगुः जनः) = अधृत गमन मनुष्य विषय-वासनाओं से जिनकी गति रोकी नहीं जाती वे मनुष्य, आपके शासन को तोड़ते हैं। ये देव व अध्रिगुजन सदा स्वराज्य का उपभोग करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम देव व विषयों से न रोकी हुई गतिवाले बनकर प्रभु के शासन में चलें, तथा सदा स्वराज्य का उपभोग करें। विषयों व किन्हीं दूसरों के पराधीन न हो जायें।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - No power can violate your sphere of self-rule and sovereignty nor what you ordain, neither human nor super human howsoever irresistible it be.