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तम्व॒भि प्रार्च॒तेन्द्रं॒ सोम॑स्य पी॒तये॑ । तदिद्ध्य॑स्य॒ वर्ध॑नम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tam v abhi prārcatendraṁ somasya pītaye | tad id dhy asya vardhanam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तम् । ऊँ॒ इति॑ । अ॒भि । प्र । अ॒र्च॒त॒ । इन्द्र॑म् । सोम॑स्य । पी॒तये॑ । तत् । इत् । हि । अ॒स्य॒ । वर्ध॑नम् ॥ ८.९२.५

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:92» मन्त्र:5 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:15» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:9» मन्त्र:5


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पूजन- सोमकण-दिव्यता का वर्धन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (तं इन्द्रं उ) = उस शत्रु-विद्रायक प्रभु को ही (अभि प्रार्चत) = आभिमुख्येन पूजित करनेवाले बनो। प्रात:-सायं प्रभु का ही पूजन करो। यह पूजन ही (सोमस्य पीतये) = सोम के रक्षण के लिये होगा। इसी प्रकार सोम का रक्षण होगा। [२] (तत् इत् हि) = वह पूजन द्वारा सोम का रक्षण ही (अस्य वर्धनम्) = उपासक के जीवन में प्रभु का वर्धन करनेवाला होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रात:- सायं प्रभु-पूजन करते हुए सोमरक्षण द्वारा अपने जीवन में प्रभु का वर्धन करनेवाले बनें, जीवन को अधिकाधिक दिव्य बना पायें।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Honour and appreciate Indra with words of gratefulness and adoration for the consumption, protection and promotion of the soma homage offered by the people. That tribute of honour is the real exalting strength and success for the ruler.