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ए॒वा रा॒तिस्तु॑वीमघ॒ विश्वे॑भिर्धायि धा॒तृभि॑: । अधा॑ चिदिन्द्र मे॒ सचा॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

evā rātis tuvīmagha viśvebhir dhāyi dhātṛbhiḥ | adhā cid indra me sacā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ए॒व । रा॒तिः । तु॒वि॒ऽम॒घ॒ । विश्वे॑भिः । धा॒यि॒ । धा॒तृऽभिः॑ । अध॑ । चि॒त् । इ॒न्द्र॒ । मे॒ । सचा॑ ॥ ८.९२.२९

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:92» मन्त्र:29 | अष्टक:6» अध्याय:6» वर्ग:20» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:9» मन्त्र:29


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दान की वृत्ति व प्रभु मित्रता

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (तुवीमघ) = महान् ऐश्वर्यवाले प्रभो ! (विश्वेभिः) = सब (धातृभिः) = धारणात्मक कर्मों में प्रवृत्त उपासकों से (एवा) = सचमुच (रातिः) = दान की वृत्ति (धायि) = धारण की जाती है। इस वृत्ति के बिना धारणात्मक कर्मों का सम्भव भी तो नहीं। [२] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (अधा) = अब (चित्) = निश्चय से आप (मे सचा) = मेरे साथ होते हैं। दान की वृत्ति ही मुझे आपका प्रिय बनाती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम दान की वृत्ति को अपनाकर धारणात्मक कर्मों में प्रवृत्त होते हैं। यह वृत्ति ही मुझे प्रभु की मित्रता को प्राप्त कराती है।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, generous lord of the wealth and glory of the world, thus by practice and meditation, is divine generosity cultivated and achieved by all those who bear and bring the offerings to you. O lord of power and immense generosity, be my friend and companion.